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आन्द्रेई तारकोवस्की के उद्धरण

कला निरर्थक हो जाती, अगर संसार पूर्ण होता; क्योंकि तब मनुष्य संतुलन की तलाश न करता, बल्कि उसमें जीने लगता।

अनुवाद : पंकज प्रखर