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भर्तृहरि के उद्धरण

कहीं सत्य, कहीं असत्यवादी, कहीं कठोर, कहीं प्रियभाषिणी, कहीं हिंसा करने वाली, कहीं दयालु, कहीं लोभी, कहीं उदार, कहीं नित्य प्रति बहुत द्रव्य व्यय करने वाली और कहीं बहुत से संचय करने वाली यह राजनीति—वेश्या के सामान अनेक रूप से रहती है।