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कुँवर नारायण के उद्धरण

कबीर या ग़ालिब की भाषा अक्सर यह भ्रम उपजाती है कि वह आसान है, क्योंकि उसमें पहचाने जा सकनेवाले रोज़ की भाषा के शब्द हैं। लेकिन उनकी कविता वस्तुतः शब्द-कठिन नहीं, अर्थ-कठिन कविता है।