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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

जो कुछ सरल है, स्वाभाविक है, उन्मुक्त और उदार है, जिसको कीमत देकर ख़रीदना नहीं पड़ता, विधाता ने जिसे प्रकाश और वायु की तरह सर्वसाधारण को बिना माँगे दान किया है, उसे भी मनुष्य दुर्गम बना देता है। इसीलिए सरल विचार और सरल भाव व्यक्त करने के लिए असाधारण महत्ता ज़रूरी होती है।