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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

जो उन्मत्त प्रेम प्रियजन को छोड़ और सब कुछ भुला देता है, वह समस्त विश्वनीति को अपने प्रतिकूल कर लेता है। इसीलिए वह प्रेम कुछ ही दिनों में असहनीय हो उठता है, सबके विरुद्ध स्वयं को स्वयं ही वह और वहन नहीं कर पाता।

अनुवाद : चंद्रकिरण राठी