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विश्वनाथ त्रिपाठी के उद्धरण

जिस व्यवस्था में स्वतंत्र व्यक्तित्व के निर्माण की छूट ही न हो, उसमें सच्चे प्रेम और सच्ची घृणा का अवकाश कहाँ?