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अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण

जिस तरह से शब्द, सुर और लय वैसे ही रंग, रेखा और रूप––तीनो मिलकर एक होना चाहते हैं। जो रूपांकन में दक्ष होता है; वह इन तीनों को एक करने का उपाय जानता है, किंतु जो इसमें ज़रा भी दक्ष नहीं है; वह तीनों को अलग-अलग रखता है, नहीं तो इन्हें बड़ी खींच-तान के बाद इस तरह मिलाता है, जिससे इनकी अपनी श्री, अपना छंद-पर्यंत नष्ट होकर एक भद्दी वस्तुओं की समष्टि बन जाति है।

अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी