जिस प्रकार युक्ति से काटे हुए; काष्ठ के छोटे-बड़े विभिन्न आकार वाले खँड़ों को जोड़कर हम अखंड चतुष्कोण या वृत्त बना सकते हैं, परंतु उनकी विभिन्नता नष्ट करके तथा सबको समान आकृति देकर हम उन्हें किसी पूर्ण वस्तु का आकार नहीं दे सकते, उसी प्रकार स्त्री-पुरुष के प्राकृतिक-मानसिक वैपरीत्य द्वारा ही हमारा समाज सामंजस्यपूर्ण और अखंड हो सकता है, उनके बिंब प्रतिबिंब भाव से नहीं।