जिस महाकाव्य अर्थात् ब्रह्मज्ञान के आगे त्रैलोक्य का राज्य फीका हो जाता है, उसे प्राप्त होकर भोजन, वस्त्र और मान के रुचि वाले भोगों में प्रीति मत करो। वही एक भोग सबसे श्रेष्ठ और नित्य उदित प्रकाशित है, जिसके स्वाद के सम्मुख त्रैलोक्य का राज्य आदि सब ऐश्वर्य निरस और तुच्छ हो जाते हैं।