जैसे ही किसी के प्रणाम करते ही; साथ-साथ स्वयं दीनता से तुम्हारा सिर झुक जाता है, सेवा लेने के लिए मन एकदम राजी नहीं है, वरन् सेवा करने के लिए मन सब समय व्यस्त रहता है, आदर्श की बात कहते ही प्राण में आनंद होता है—तुम्हें भय नहीं, तुम मंगल की गोद में हो और नित्य और भी अधिक ऐसे ही रहने की चेष्टा करो।
अनुवाद :
श्रीरामनंदन प्रसाद