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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

जहाँ साधना निरंतर चलती रहती है; जहाँ जीवन-यात्रा सरल और निर्मल है, जहाँ सामाजिक संस्कार की संकीर्णता नहीं है, जहाँ व्यक्तिगत और जातिगत विरोध को दमन करने का प्रयास है, वहीं हम उस विद्या को प्राप्त कर सकते हैं—जिसे भारतवर्ष ने विशेष रूप से 'विद्या' का नाम दिया है।