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महादेवी वर्मा के उद्धरण

जब तक प्रकृति व्यक्त नहीं होती, तब तक विकृति के ध्वंस में अपनी शक्तियों को उलझा देना वैसा ही है—जैसा प्रकाश के अभाव में अँधेरे को दूध से धो कर सफ़ेद करने का प्रयास।