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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

जब तक मनुष्य बना रहेगा, तब तक मानव-जाति के अधिकांश को किसी न किसी स्थूल आलंबन की ज़रूरत होगी, जिसके चारों ओर वह अपनी सारी भावनाओं को स्थापित कर सके, जो मन के सभी भावनात्मक आकारों का केंद्र हो सके।

अनुवाद : पण्डित द्वारकानाथ तिवारी