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अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण

हम जब अपने निजी जीवन से संबंधित किसी प्रसंग की चर्चा करते हैं, तब उसे हम उस दृष्टि से देखते हैं, जिस प्रकार कोई माँ अपने पुत्र को देखती है।

अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी