हिंदी के वर्णवादी अध्यापक इसलिए परेशान है कि अगर कबीर दलित ले गए, तो निर्गुण परंपरा का क्या होगा? सामाजिक एकता समरसता का क्या होगा? द्विवेदी जी का क्या होगा? उस उदारता का क्या होगा, जो हमारे हिंदी साहित्य के इतिहास ने भक्ति काल में पैदा की, जिसमें मानव-मानव एक हो गया।