रामचंद्र शुक्ल और द्विवेदी में और इन दिनों संघ की इतिहास की अवधारणाओं में, एक भयानक समानता यही है कि ये सब इतिहास को एक अटूट धारा मानते हैं और कर्ता के भाव को एक अन्विति में पिरोया जाता मानते है, जिसमें कबीर की आलोचना का तत्व एक विरेचक का काम करता है बस।