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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

हमारा व्यक्तित्व जितना शक्तिशाली होगा; उतने ही बल से वह विश्व की विशालता की ओर खिंचेगा, क्योंकि उसकी शक्ति का केंद्र स्वयं उसमें नहीं; बल्कि विश्व में है। उसी तरह जैसे झील की गहराई पृथ्वी में खुदी खाई से नहीं मापी जाती—पानी की सतह से मापी जाती है।

अनुवाद : सत्यकाम विद्यालंकार