रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण
हमारा मन दर्पण नहीं, वह सृष्टि का प्रधान उपकरण है। जिस क्षण हम देखते हैं, उसी क्षण देखने के योग से सृष्टि होती है। जितने मन हैं, उतनी ही 'सृष्टियाँ' हैं। अवस्था परिवर्तन से मन की प्रकृत्ति यदि बदल जाए तो सृष्टि भी दूसरी तरह की होगी।
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