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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

एकांगी भाव ही जगत् के लिए अनिष्टकर वस्तु है। तुम अपने अंदर जितने विविध पक्षों को विकसित कर सकोगे, उतनी ही आत्माएँ तुमको उपलब्ध होंगी और जगत को तुम समस्त आत्माओं के माध्यम से—कभी भक्त के, कभी ज्ञानी माध्यम से देख सकोगे।