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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

द्वैतवादी मानते हैं कि ‘मैं और मेरा’ का प्रयोग केवल ईश्वर के संबंध में ही करना चाहिए। ‘मैं’ का संबोधन केवल वही कर सकता है, और सारी चीज़ें भी उसी की हैं। जब मनुष्य इस स्तर पहुँच जाए कि ‘मैं और मेरा’ का भाव उसमें न रहे, सारी चीज़ों को ईश्वरीय मानने लगे, हर प्राणी से प्रेम करने लगे, और किसी पशु के लिए भी अपना जीवन देने के लिए तैयार रहे और ये सारे भाव बिना किसी प्रतिफल की आकांक्षा से हों, तो उसका हृदय स्वतः पवित्र हो जाएगा, तथा उस पवित्र हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम उत्पन्न होगा। ईश्वर ही सभी आत्माओं के आकर्षण का केंद्र है।