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भामह के उद्धरण

धर्म, अर्थ और काम के प्रतिपादक शास्त्रों तथा दंडनीति को न्याय कहते हैं। जहाँ इनका विरोध हो, वहाँ न्यायविरोधी दोष कहलाता है।

अनुवाद : रामानंद शर्मा