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गजानन माधव मुक्तिबोध के उद्धरण

‘भारतमाता ग्रामवासिनी’ से लेकर, तो आगे ‘हँसते-हँसते कृष्ण बन गए मन में, जनमंगल हित है’ तक जो जनोन्मुख भावनाएँ पंतजी ने प्रकट कीं—वे उनकी सहज सहानुभूति ही का विस्तार थीं।