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अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण

बच्चों की अक्षय कल्पना उन्हें खेल में संलग्न रखती है, किसी एक पुराने खेल की स्मृति के आधार पर वह सारे नए-नए खेलों की रूप-रचना करता हुआ चलता रहता है।

अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी