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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण

अनुभूति द्वारा जो जाना जाए, वही ज्ञान है। जानने को ही वेद कहते है और वेद अखंड है। जो जितना जानता है, वह उतना ही भर वेदवित् है।

अनुवाद : श्रीरामनंदन प्रसाद