अँग्रेज़ी के प्रचुर ज्ञान और हिंदी के कामचलाऊ ज्ञान वाले लेखकों की एक नई भाषा विकसित हो रही है जिसमें ‘साहसिक’ का अर्थ पारंपरिक रूप से समुदी डाकू या लुटेरा नहीं, बल्कि ‘साहसपूर्ण’ है। ‘कारुणिक’ का अर्थ ‘करुणामय’ नहीं बल्कि ‘कारूण्य उत्पादक है’, ‘निर्भर है’ के बजाए ‘निर्भर करता है’ लिखा जाने लगा है और ‘शाप’, ‘नरक’ और ‘विरूप’ जैसे शब्दों को ‘श्राप’, ‘नर्क’ और ‘विद्रूप’ बना लिया गया है। अजब नहीं कि कुछ वर्षों बाद इस भाषा में ‘कृपया’ को ‘कृप्या’ लिखा जाने लगे।