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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

आत्मा ही एकमात्र प्रकाशक है, मन उसके हाथों यंत्र के समान है। और इस यंत्र के माध्यम से आत्मा बाह्य साधन पर अधिकार जमा लेती है—इसी प्रकार प्रत्यक्ष बोध होता है।