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मैनेजर पांडेय के उद्धरण

आधुनिक प्रेम-कविता को छोड़ भी दें, तो कालिदास के 'मेघदूत' से घनानंद की कविता तक फैली हुई, प्रेमकाव्य की उदात्त परंपरा में सम-विषम की कोई चिंता नहीं है।