पॉलिटिकली करेक्ट होने के उथले, उम्र दुराग्रह ने समकालीन हिंदी कथा-साहित्य की उड़ने और ग़ोताख़ोरी करने की क्षमता को बाधित किया है। एक अच्छी किताब अपनी 'पॉलिटिकल करेक्टनैस' अपने आंतरिक तर्कों से अर्जित करती है।
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किसी किताब से प्रेम किए बिना सच्चे अर्थों में उसका अनुवाद संभव नहीं।
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जिन लोगों ने वास्तविक प्रेम नहीं किया, उन्हें कभी पता नहीं लगेगा कि वह भी एक तरह का परिश्रम ही है। एक करुणामय, धैर्य भरा परिश्रम।
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हम पर्याप्त, बल्कि औसत तौर पर अति-मुखरता के अभ्यस्त है। हम चाहते है कि शब्द अर्थ का संपूर्ण वक्तव्य हो, अर्थ का संकेत नहीं।
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हिंदी में सामाजिक यथार्थवाद का एक फूहड़ रूप, एक अचल मानक की तरह स्वीकृत है।
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