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जोइंदु

आदिकाल की जैन-काव्य-परंपरा के महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक।

आदिकाल की जैन-काव्य-परंपरा के महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक।

जोइंदु की संपूर्ण रचनाएँ

दोहा 10

पंचहँ णायकु वसिकरहु, जेण होंति वसि अण्ण।

मूल विणट्ठइ तरुवरहँ, अवसइँ सुक्कहिं पण्णु॥

पाँच इंद्रियों के नायक मन को वश में करो जिससे अन्य भी वश में होते हैं। तरुवर का मूल नष्ट कर देने पर पर्ण अवश्य सूखते हैं।

देउल देउ वि सत्थु गुरु, तित्थु वि वेउ वि कब्बु।

बच्छु जु दोसै कुसुमियउ, इंधणु होसइ सब्बु॥

देवल (मंदिर), देव, शास्त्र, गुरु, तीर्थ, वेद, काव्य, वृक्ष जो कुछ भी कुसुमित दिखाई पड़ता है, वह सब ईंधन होगा।

बलि किउ माणुस जम्मडा, देक्खंतहँ पर सारु।

जइ उट्टब्भइ तो कुहइ, अह डज्झइ तो छारु॥

मनुष्य इस जीवन की बलि जाता हैं (अर्थात् वह अपनी देह से बहुत मोह रखता है) जो देखने में परम तत्व है। परंतु उसी देह को यदि भूमि में गाड़ दें तो सड़ जाती है और जला दें तो राख हो जाती है।

जो जाया झाणग्गियए, कम्म-कलंक डहेवि।

णिच्च-णिरंजण-णाणमय, ते परमप्प णवेवि॥

जो ध्यान की अग्नि से कर्मकलंकों को जलाकर नित्य निरंजन ज्ञानमय हो गए हैं उन परमात्मा को नमन करता हूँ।

रूवि पयंगा सद्दि मय, गय फांसहि णासंति।

अलि-उल गंधहि मच्छ रसि, किमि अणुराउ करंति॥

रूप के भ्रम में पतंग, शब्द के वशीभूत हो मृग, स्पर्श के लालच में गज, गंध के लालच में अलिकुल तथा रस में मत्स्य नष्ट होते हैं। यह जानकर विवेकी जीव क्या विषयों में अनुराग करते हैं!