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भक्ति-काव्य की कृष्णभक्त शाखा के माधुर्योपासक कवि। राधावल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक।

भक्ति-काव्य की कृष्णभक्त शाखा के माधुर्योपासक कवि। राधावल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक।

हितहरिवंश के दोहे

रसना कटौ जु अन रटौ, निरखि अन फुटौ नैन।

स्रवन फुटौ जो अन सुनौ, बिनु राधा-जसु बैन॥

सबसौ हित निहकाम मन, बृंदाबन बन विस्राम।

राधावल्लभ लाल कौ, हृदय ध्यान, मुख नाम॥

तनहिं राखु सतसंग में, मनहिं प्रेमरस भेव।

सुख चाहत ‘हरिवंस हित', कृष्ण-कल्पतरु सेव॥

निकसि कुंज ठाढ़े भये, भुजा परस्पर अंस।

राधावल्लभ-मुख-कमल,निरखत ‘हित हरिबंस'॥