Ambikadatt Vyas's Photo'

अंबिकादत्त व्यास

1858 - 1900 | जयपुर, राजस्थान

'भारतेंदु मंडल' के कवियों में से एक। कविता की भाषा और शिल्प रीतिकालीन। 'काशी कवितावर्धिनी सभा’ द्वारा 'सुकवि' की उपाधि से विभूषित।

'भारतेंदु मंडल' के कवियों में से एक। कविता की भाषा और शिल्प रीतिकालीन। 'काशी कवितावर्धिनी सभा’ द्वारा 'सुकवि' की उपाधि से विभूषित।

अंबिकादत्त व्यास का परिचय

भारतेंदु हरीशचंद्र के समसामयिक हिंदी सेवियों में अंबिकादत्त व्यास प्रसिद्ध हैं। ये भारतेंदु मंडल के सुप्रतिष्ठित कवि एवं लेखक रहे हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के काशी के साहित्यकारों में इनका उल्लेख विशेष रूप से किया जाता है। इनका जन्म सन् 1848 ई. में हुआ था अंबिकादत्त व्यास कवित्त-सवैया की प्रचलित शैली में काव्य रचना करने वाले ब्रजभाषा के सफल कवि थे। तत्कालीन काशी कवि-समाज के सक्रिय सदस्य के रूप में इन्होंने जो समस्या पूर्ति की हैं वे बड़ी सरस बन पड़ी हैं।

इनके कवि-रूप की सबसे बड़ी देन इनका 'बिहारी-बिहार' (सन् 1898 ई.) नामक ग्रंथ है। इसमें बिहारी-सतसई के दोहों के आधार पर रचित कुण्डलियाँ संकलित हैं। बिहारी के दोहों के मूल भाव को पल्लवित करने में इन्हें बड़ी सफलता मिली है। अंबिकादत्त व्यास ने खड़ी बोली में नये-नये विषयों पर बहुत-सी फुटकर रचनाएँ की हैं। बंगला काव्य की नयी धारा से प्रभावित होकर इन्होंने कुछ अतुकांत काव्य-रचना की चेष्टा भी की थी, परंतु इस कार्य में इन्हें सफलता नहीं मिल पायी। इनकी पुरानी-नयी परिपाटी की फुटकर रचनाएँ इनके समसामयिक पत्रों (पीयूष प्रवाह, समस्या-पूर्ति-प्रकाश) में प्रकाशित मिलती हैं। किसी स्वतंत्र संकलन के विषय में कुछ पता नहीं चलता। रामचंद्र शुक्ल ने इनकी एक 'पावस-पचासा' नामक पुस्तक का उल्लेख मात्र किया है। इन्होंने भारतेंदु से प्रभावित होकर कुछ नाटक लिखे थे, जिनमें दो नाटय-कृतियाँ उल्लेख्य रही हैं। पहली कृति ‘ललिता’ (नाटिका) 1884 ई. ब्रजभाषा में है। यह भारतेंदु कृत ‘चंद्रावली’ की शैली में लिखी गयी है। इसकी विषय-भूमि कृष्ण-लीला से संबद्ध है। दूसरी कृत्ति ‘गोसंकट’ 1887 ई. गोरक्षा आंदोलन विषयक एकांकी नाटक है। इसकी कथा वस्तु को ऐतिहासिक परिवेश दिया गया है और मुगलकाल में अकबर द्वारा गो-बध बंद किये जाने की बात कही गयी है। सन् 1893 ई. में ‘आश्चर्यवृत्तांत' नामक मनःकल्पना (फैंटेसी) प्रकाशित हुई। नाटय-शिल्प की दृष्टि से इनकी कृतियाँ बहुत सफल नहीं हो पायी हैं। इनमें आधुनिकता का अभाव है। अंबिकादत्त व्यास अपने समय के प्रख्यात पंडित और कुशल वक्ता थे। हिंदी और संस्कृत पर इन्हें समान रूप से अधिकार था। ये कट्टर सनातनधर्मी थे और अपने व्याख्यानों द्वारा सनातन धर्म का प्रचार किया करते थे। इन्होंने कुछ धार्मिक पुस्तकें भी लिखी हैं जिनमें ‘अवतारमीमांसा’ प्रसिद्ध है।

इन्होंने गद्य और पद्य पर भी सम्यक् रूप से विचार-विवेचन किया है। इनकी भाषा-शैली सदोष है। जगह-जगह पर पंडिताऊ प्रयोग प्राप्त होते हैं। विरामादिक चिह्नों के व्यवहार में बड़ी अव्यवस्था मिलती है। विभक्तियों के प्रयोग भी प्रायः अशुद्ध हैं। इनके गद्य-ग्रन्थों में ‘गद्य-काव्य-मीमांसा’ (1897 ई.) उल्लेखनीय है।

अंबिकादत्त व्यास ने सन् 1884 ई. में काशी से एक पत्र निकाला था। पहले यह 'वैष्णव-पत्रिका' के नाम से सनातन धर्म की सेवा में संलग्न हुआ, बाद में 'पीयूष प्रवाह' नाम से साहित्य-सेवा के क्षेत्र में अग्रसर हुआ। सन् 1900 ई. में इनका देहावसान हो गया।

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