आसान होता है लिखना
कुछ चीज़ों के बारे में यूरोप में
आसान होता है जैसे
कहना कि रोम में समय
संगमरमर का है
आसान है लिखना
एथेंस की रोशनी के बारे में
स्टॉकहोम के अंधकार के बारे में
कापरी के समुद्र के बारे में
आसान है ध्यान लगाना
लंदन के एक पार्क में
खोलना एक खिड़की वेनिस में
या फिर एक दरवाज़ा माद्रिद में
शायद इसलिए कि यूरोप में
हर किसी के पास है बीमा
उसके साए का
कंकाल का
हर कोई संभ्रांत है
आदत है जिसे
नर्म भुने गोश्त के साथ
जाड़ों के स्वाद चखने की
जैसे जाम हो कोई
पुरानी शराब का
पर इधर कितना मुश्किल है
भोर का आभास सांतियागो में
दूध का गिलास हवाना में
या फिर साँस लेना बोगोता में!
और इससे भी मुश्किल है
इन सबके बारे में लिखना यूरोप में
जहाँ कोई कुछ नहीं जानता
अपने बारे में भी नहीं
जहाँ सारा जीवन क़साई और ग्वाला
मुश्किल से क़साई और ग्वाला
ही रह जाता है।
और ऊपरी मंज़िल का निवासी
या फिर निचली मंज़िल का निवासी
वही पड़ोसी है जो जल्दी में सदा
जो सीढ़ियाँ चढ़ता या उतरता है
हमेशा टिप-टॉप बना मुस्कान झलकाता
सभी बटन बंद किए अपनी सँवरी
क़मीज़ के साथ।
मुश्किल है लिखना प्रेम के बारे में
इन हालात में
इससे कहीं आसान है यक़ीनन
न याद करना बोगोता को
सांतियागो को न हवाना को
मगर सबसे ज़्यादा
न याद करना पेरू को
न उसकी रौंदी हुई भव्यता को
न उसके पंखों से सुसज्जित
छवि ध्वस्त सम्राट को
न फेन भरे प्रशांत महासागर को
न उसकी दमकती मछलियों को
भूलना उस चाँद को
जिससे कभी-कभी दमकता है लीमा
और बिखेर देता है जो कडुआहट का एक वृत्त
एक दर्द भरा पिरामिड
धूल और निलंबित विलाप से बना
न याद करना कुछ सड़कों को
न ही कुछ पीली बस्तियों को
जहाँ खेलते हैं चुपचाप
बिना दाँत और बिना मुस्कान के बच्चे
मौत तक खींचते हुए
एक अभागा खिलौना
थके हुए काग़ज़ का
बहुत ही आसान है जी हाँ
वो जो करते हैं यूरोपीय लोग
सीढियाँ चढ़ते जाना
सीढ़ियाँ उतरते जाना
हमेशा बहुत जल्दी में
एक सहृदय मुस्कुराहट
और बग़ल में अख़बार
या फिर उससे भी बेहतर
न चढ़ना या उतरना सीढ़ियाँ
न पढ़ना नया अख़बार
न ही पुराना अख़बार
न याद करना पेरू को
भुला देना लीमा को हमेशा के लिए
मगर फ़्लोरेंस को भी
पेरिस को और रोम को भी
न टेकना घुटने वेनिस के आगे
न ही उसके सागर तिंतोरेतो के आगे
न ही उसके बैंगनी आसमान के आगे
न मुस्कुराना ल्योनार्दो के साथ
न नशे में झूमना बाख के साथ
न सुबह करना रांबों के साथ
न लिखना प्रेम के बारे में
यूरोप में
न आदर करना उसके खंभों का
महलों का न मंदिरों का
उसके बाग़ों का न किताबों का
न सिसकना सेन के किनारे
न ही निहारना तिर्रेनो को
यही सब कुछ तो भरता है वहाँ रोशनी
निराशा और फेन
मूर्ति को मानव समझ न उलझ जाना
न मानव को मूर्ति समझना
न ही सान पेद्रो की गुंबद को
पेद्रो की टोपी समझना
समझना कि यह सब
न प्रेम है न ही जीवन है न मरण
यहाँ तक कि एक कविता भी नहीं ये
मात्र चीख़ है ये
एक अभागा खिलौना
लिखे हुए काग़ज़ का।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 79)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
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