यादों की कविता
yadon ki kavita
अक्तूबर की तेईसवीं तारीख़ उस बरस
था मौसम पतझड़ का मृदुल मदिर
सुनहरे पत्ते चमचमाता धुपहला दिन सभी कुछ वैसा
जैसा कि चाहा पेतोफ़ी ने
और चूँकि हमारी आख़िरी क्लास रद्द हो गई थी
हमने भकोस लिया लंच कैंटीन में
एझीं गुबिच के साथ और
चले आए मार्केट स्ट्रीट की
पुरानी किताबों की दुकान में
(उन दिनों
दैब्रैत्सैन में मुझे नहीं लगता
ऐसी कोई और दुकान थी भी)
दो फ़ोरिंत में कोस्तोलान्यी का
उनकी मृत्यु के बाद 1936 में प्रकाशित
जीवित कवि नाम का संचयन ख़रीदा और
(गोया एक पुस्तक-पत्रक पर) लगा दिया निशान
ताकि सनद रहे किताब यह एवॉ तोथ की है
और लिख दी तारीख़ भी
यही मैं करती थी उन दिनों
फिर हम चले आए देरी म्यूज़ियम में जहाँ
बाग़ीचा था जिसमें
धँसा हुआ-सा एक बाग़ीचा था जिसमें
हम खेला करते थे तभी से जब से
घेराबंदी हुई
ठहराया गया था हमें बिशप के कोर्ट में
पियानोवादक तिहॉमेर सेंदी के फ़्लैट में
जो कि बमबारी से बच कर दूसरे युद्ध में
भाग निकला था न्यीरमिहाइदि शहर की ओर
जबकि हम आ गए थे योशिकॉ स्ट्रीट और कॉश्शॉ स्ट्रीट के कोने पर
(जो बाद में लिबर्टी स्ट्रीट कहलाई) जहाँ आ गए रूसी
मिस्टर चोकॉ के पब के तहख़ाने में
और हमारे घर पर आ गिरा था बम
(दरअसल घर हमारा नहीं था हम महज़ किराएदार थे उसमें)
और तभी हम मिस्टर चोकॉ के तहख़ाने में
पचासेक दूसरे लोगों के पास जा बसे थे
हमें डर था मेरे बापू को
उठा ले जाएँगे जर्मन
वह फ़ौज में नहीं थे क्योंकि बचपन में
यूलिश्का चाची के घर उनके फ़ार्म पर धुलाई वाले एक दिन
उन्होंने धोखे से पी लिया था कॉस्टिक सोडा
क्योंकि उनके मग में कॉस्टिक सोडा पड़ा था
और उन्हें बड़ी ज़ोर की प्यास लग आई थी
क्योंकि उस दिन बेहद गर्मी थी और
नहान-कुंड के कगार पर रखे मग तक
उनका हाथ पहुँच गया और फ़ौरन
उन्होंने गटक लिया उसे....
मगर ध्यान रहे हमारा कोई नुक़सान नहीं किया जर्मनों ने
न ही पहले-पहल आने वाले रूसियों ने
मैं तहख़ाने के दरवाज़े से लगी सो रही थी जब वे आए
और उनमें हर एक फ़ौजी गबरू जवान था
वे हँसे-रोए हमें तस्वीरें दिखाईं
घुटनों पर बच्चों को ले उन्हें दुलराया वैसे ही
जैसे बाद में जाँबाज़ मुक्तिदाता सोवियत सेना के बारे में
बनी हुई फ़िल्मों में दिखाया गया
उन्होंने गाया वोल्गा वोल्गा
एक ने मुझे ब्रूच दिया छोटा-सा जो
मछली जैसा था लेकिन वैसा नहीं
जो मॉकोंदो में कर्नल ऑरेलिआनो बुएंदियाँ
बनाया करते थे
क्योंकि वे होते थे सोने के और वह
उन सब को गला-गला कर फिर से
बनाने लगते थे....
मेरा ब्रूच चमाचम सुनहरी पीली पुश्त पर मढ़ा
लाल शीशे का बना था पर कुछ ही समय में
मुझसे खो गया वह कहीं
और मैं बीस की हुई तब तक
कोई और नग लगा नहीं हाथ
क्योंकि मेरे कर्णफूल बापू ने गड़ा दिए
मेरी माँ की और अपनी ब्याह की अँगूठी और
दो ग़ज़ टार्टान कपड़े के साथ जलावन के कोठर में
पड़ोसी ने खोद निकाली वे चीज़ें और जब
मेरे बापू को पता लगा वे सीधे जा पहुँचे उसके पास
और बोले मिस्टर कोवाच ख़बरदार
दुपहर तक लेकर आ रहा हूँ पुलिस को मैं
और मिस्टर कोवाच बेहद ख़बरदार हुए
और पुलिस को नहीं मिला कुछ भी
और मिस्टर कोवाच ने ताबड़तोड़
बम से मिटे मकान के एवज़ में
उससे भी बड़ा एक घर खड़ा कर लिया
बिशप के कोर्ट चलें हालाँकि
नहीं था वह बिशप का कोई महल
कुठरियों की चाल थी
बहरहाल जब हम वहाँ रहते थे और
देरी म्यूज़ियम के बग़ीचे में
खेला करते थे
हमें मज़ा आता था मेजेसी मूर्तियों पर चढ़ने में
बहुत आसान था लूमना-लटकना
उन पर उनकी बाँहों, टाँगों, घुटनों पर यहाँ तक कि कंधों पर
एक आदमी अपने हाथ में उठा ले अपने से छोटा एक आदमी
यह हुआ मानवजाति-शास्त्र-एथ्नोग्राफ़ी
मुझे सबसे ज़्यादा पसंद था पुरातत्त्व
कोमल चेहरे वाली एक नंगी औरत जिसके
सिर पर कनटोप
मगर चूँकि काँसे की बनी थीं वे मूर्तियाँ
इसलिए फ़रक़ नहीं पड़ता कि नंगी थीं
अगले रूसी उतने दयालु नहीं निकले और उनके साथ
रूमानियाई भी थे
पब की दीवार से सटा दीं उन्होंने
अपनी फ़ील्ड-तोपें
तोपची बारकों पर गोले बरसाए
एक जवान फ़ौजी बापू पर चिल्लाया
जर्मन-जर्मन और ठूँस दी उनके मुँह में
टॉमी-गन
चीख़ी माँ हमको पठाया उधर हम चीख़ें
बापू! बापू! एक बूढ़े-से सैनिक ने
कुछ कहा उस जवान सैनिक से
बाँह से पकड़ उसे खींच कर ले गया
यूँ मेरे बापू की उन दिनों
चार्ली चैप्लिन जैसी मूँछें थीं मेरे ख़याल से
दक्खिनी या दीनारी क़िस्म के काले लहरदार केश थे
मेरी माँ हो गई बेहोश जब
बंदूक़ के कुंदों से ठेलते वे ले गए जवान औरतों को
तहख़ाने की सीढ़ी से ऊपर
अम्मा पचीस की थी तीन बच्चों की माँ
मैं समझ नहीं पाई उस समय क्यों वह बेहोश हुई
और वह कितना बड़ा था सौभाग्य
क्योंकि वे अम्मा को वहीं छोड़ चले गए।
हालाँकि मैं छह-एक साल की थी और
रेडियो सुनती थी
जबकि माँ लगी होती धोने-धाने में या नन्ही इलिकै के
शायद बॉन्दी के भी
पोतड़े बदलने में
और मैं छुटकी कुर्सी में बैठी-बैठी
रेडियो सुना करती और बताती माँ को
जब वे कहते दैब्रैत्सैन पर
दुश्मन जहाज़ उड़े आते हैं
हम फ़ौरन दुबक जाते बंकर में या फिर शरण लेते वन में या
अगर देर हो चुकी होती तो अम्मा
चौके के कोने हम तीनों के ऊपर
झुक कर खड़ी हो जाती क्योंकि सुन रखा था उन्होंने रेडियो पर कि
एक मकान ढह गया लेकिन
बच गया बच्चा क्योंकि
उस पर झुकी खड़ी थी माँ उस की
माँ डरती नहीं थी जब जहाज़ आते थे
बोझी और कॉतो रोती चिल्लाती, चहकती
दौड़ती रहती थीं आँगन में लोट-पोट
पर मैं डर गई बमों से और
स्टालिन कैंडिल से जब
बमक उठा तेल-घर
और मैं डरने लगी स्तालिन ऑर्गन से भी
और एक बार मेरी चड्डी भी
भीग गई
1989 में ऑक्सफ़ोर्ड में
सेंट कैथरिन कॉलेज की ऊँची मेज़ पर
बैठी थी जब मैं
तब जाकर समझी कि क्यों मैं बेचैन
हो जाया करती थी इतनी ज़्यादा जब भी
रेडियो या टी वी गरजते थे
पूरे ज़ोर शोर से
मिस्टर चोकों के तहख़ाने से चल कर हम
जा टिके टाउन हॉल के तहख़ाने में
और रूसियों ने हमें खदेड़ा वहाँ से भी
हमने पकड़ ली मार्केट स्ट्रीट और ग्रेट चर्च की तरफ़ चल पड़े
साथ में लिया नन्हीं इलिकै को और
सारा असबाब भर लिया बच्चा गाड़ी में
झुटपुटा होने लगा कर्फ़्यू जारी था
और इस तरह हम बिशप के कोर्ट तक आए और वह फ़्लैट
तिहॉमेर सेंदी का नहीं बल्कि एमिल सॉबो का था
वही था जो अपना परिवार ले
नीरमिहाइदी चला गया और
तिहॉमेर सेंदी वायलिन वादक था और चाबी थी उसके पास
और मैंने कभी इतना ख़ूबसूरत और बड़ा फ़्लैट देखा नहीं था
लेकिन माँ ने मना किया दूसरे कमरों में
रखा कुछ भी छूने से
हालाँकि मैं देखना चाहती थी पियानो
फिर रूसी आ गए और उसे उठा ले गए ऐन उस वक़्त जब
सॉबो परिवार सीढ़ियाँ चढ़ता आता था
लेकिन वे रूसी दयालु-हृदय और बच्चों को प्यार करने वाले थे
और अम्मा ने मुझे उनसे नसवार रंग की
पखेरू रुई और दूसरी कई चीज़ें
माँग लाने भेजा
और उन्होंने हमें चीज़ें ले जाने दीं और
उनके साथ था एक दुभाषिया
और इस तरह कई सारी चीज़ें बचा ली गईं
फिर हमें बिशप कोर्ट छोड़ना पड़ा लेकिन
उससे पहले ही बाच्का ज़िले से बाझॉ मॉत्सा और ज़ोली के साथ
आ पहुँचे मेरे दादा-दादी
हम रहने लगे चाची बोझी के यहाँ हात्वान स्ट्रीट पर
मुटल्ले बिल्ले बॉलोघ के मकान में
जिसे आगे जा कर कूलाक क़रार दिया गया और
और कर दिया गया जलावतन
हाँ चाचा बॉन्दी भी किए गए जलावतन
भले ही वे वैगन कारख़ाने में मजूर थे
लेकिन उन्होंने बनाई थी एक थ्रैशिंग मशीन
और थ्रैशिंग का काम किया करते थे
चाची रोज़ी ने रेल की छत पर
बैठ कर सफ़र किया बुदॉपैश्त तक
हर किसी से वह बतिया सकती थीं
रूसियों से, रूमानियाई से भी
फिर शॉन्यी और यॉञ्ची लौट आए लाम से
और पेती हो गया सफ़ेद
पंद्रह की उम्र में
फिर हम रहे चोकोनॉइ थिएटर के
सामने पीजेंट्स पार्टी में लेकिन
कुछ नहीं था वहाँ खाने को और हम
माल के डिब्बे में बैठ कर
चले आए प्यूश्पौक्नादाश्द अपने दादा-दादी के संग
जब उन्हें दी गई ज़मीन और बापू भी
फ़सल की कटाई के समय आ जुड़े हमसे
नादॉश्द एक जर्मन गाँव था जहाँ से जर्मन कर दिए गए थे जलावतन
लेकिन बहुत से भाग कर लौट आए उन्हीं दिनों
दादी का छोटा-सा क़ुनबा
कलपने लगा अपने गाँव की याद में
और लौट आया दैब्रैत्सैन
वे रहने लगे दूर के एक छोटे-से घर में
शीदो परिवार के साथ रेड स्टार सहकारी घर में
जो बच कर लौटे थे ट्रांसिल्वानिया से
जब बंद हो गई पीज़ेन्ट्स पार्टी
हम आ गए बौसौर्मेन्यी स्ट्रीट के
फ़्लैटनुमा कोठर में जहाँ नम थीं दीवारें
फिर आए उजड़ी क्रबर से लगी दोबोत्सी गली में
जहाँ मेरी फैहेरतॉइ दादी माँ दफ़न थीं
फिर रॉकोव्स्की स्ट्रीट में जो कहलाई बाद में
शांदोर फ़्यूत और जहाँ से
ग्रेट चर्च का शिखर आता था नज़र
चौके में बर्फ़ानी ठंड थी
इसलिए जब सर्दी आई हमने चूल्हा
बड़े वाले कमरे में लगा लिया और
हम पाँचों के पाँच सोने लगे वहीं
और हम मेस के टीन के डिब्बे में पानी गरम करते
पकड़ते सँडसी से क्योंकि वह डिब्बा
होता था गरम और हम उसका पानी
उड़ेलते चिलमची में
फिर डाल देते थोड़ा ठंडा जल
और मैं पहले नहाती कमर तक फिर चिलमची
मोढ़े से नीचे रख
उसमें जा बैठती
फिर खड़ी होकर धोती पाँव भी
रोज़-रोज़ क्योंकि आख़िर मैं
बड़की हो चली थी कई बार प्रेम में पड़ी लिखी कविता
जाने लगी नाटक सिनेमा संगीत-सभा
मैंने देखा हैमलेट और इल ट्रोवेटोर
और सुना ले पेल्यूद्
ओपेन एयर थिएटर में
देखा स्पिनिंग रूम रोज़ो के साथ रेलिंग से लटक कर
कोदाई भी वहाँ होते
एम्मॉ आंटी के साथ
मैंने सीखी फ्रेंच इतालवी लैटिन थोड़ी-सी इंग्लिश
फ़िनिश रूमानियाई जर्मन और हाँ
रूसी भी
सिरिली लिपि
मुझको लुभाती थी मैंने वह
चाची लूलो के पति से
जब वह जेल-शिविर से छूट कर आए
सीख ली एक ही दुपहरी में
मैंने अपनी कापी में लिखा एवॉ आंद्रेयेव्ना तोथ
बाद में धूमकेतु अध्ययन दल की
अपनी टिप्पणियों में दिया नाम मैंने
ख़ुद अपने-आप को कुमारी तोथ फ्रेंच में
उन्हीं टिप्पणियों में लिखी कविता भी मैंने
हर पन्ने में नीचे शुरू कर उलटी तरफ़
किसी तरह अँटाते हुए
और एक डायरी भी
आइसलैंड की पुरा-लिपि रुनिक में
क्योंकि जो चित्रलिपि खोजी थी मैंने
उसके वर्णाक्षर कुछ सीधे से ही थे
अक्सर मैं जाती थी बुदॉपैश्त
एक दफ़ा सस्ती सप्ताहांत गाड़ी से ऐगैर और तोकाई भी गई
परदेस का मेरा पहला सफ़र
कोलोझवार तक ही था
किराइ हागो के गुज़रने के बाद हम
ताक रहे थे एक खेत, रेल-खिड़की से
जो लहलह था शारदीय क्रोकस केसर के फूलों से
शुरुआती अक्तूबर धूप में उजले नीले और कासनी
और देखते थे हम काली भैंसों को
और हम अब देरी म्यूज़ियम की खिड़की से
उझक रहे थे क्योंकि बाहर
शोर कुछ सुना हमने
विश्वविद्यालय और फ़ॉज़ेकॉश ग्रामर स्कूल के छात्र
पार्टी कमेटी की बिल्डिंग के आगे
नारे लगा रहे थे
और हम म्यूज़ियम से निकल कर दौड़े
मेरे गले में कुछ अटक-सा रहा था
यह कुछ वैसा ही था जैसा
मार्च की पंद्रहवीं तारीख़ को
1848 में हुआ था
और दम छोड़कर हम दौड़े
मार्केट स्ट्रीट से कोशुथ स्ट्रीट में अपने स्कूल तक
और हर क्लास रूम में चिल्ला कर बताया प्रदर्शन हो रहा है
चलो आओ फ़ौरन और हम वापस भागे
और मार्च किया वैगन कारख़ाने तक फिर प्रिंटिंग हाउस तक
और यानोश गोर्बे ने वहाँ सुनाया
राष्ट्र-आह्वान का गीत और जिस कारण
बाद में क़ैद हुई उसको
लाल सितारे को गिरा दिया उन्होंने काँच का बना था वह
धड़ाम से वह आ लगा ज़मीन से
फिर हमने मार्च किया विश्वविद्यालय तक
और फिर वापस गेट चर्च तक
और तभी अचानक बिजली गुल हो गई
और सुरक्षा पुलिस भीड़ पर गोलियाँ
दाग़ने लगी मुझे चोट नहीं आई
भागती जा पहुँची मैं घर अपने
फिर हमने मुसल्सल रेडियो सुना एक-एक पर्चा बटोर
और चूँकि लिवर्टी स्ट्रीट ही
आगे फ़ीर्स्ट शांदोर स्ट्रीट हो जाती है
इसलिए रूसी चले आए क़दम-ताल करते
ऐन हमारे घर के आगे तक
रात और दिन टैंक चले आते
उनके बीच से सड़क पार करना तक दुश्वार हो गया
फिर हमारी नींद खुली तोपों की गड़गड़ से
दिन था वह नवंबर का चौथा
और मेरी माँ ने मुझे पहना दिया काला कोट
सिर पर बाँध दिया काला रूमाल
तहख़ाने तक जाने से पहले
छुपा ले चली मुझे बदसूरत बुढ़िया की हलिया में
लेकिन उन्हें सफलता मामूली मिली क्योंकि
मैं काफ़ी ख़ूबसूरत थी और अभी
अट्ठारह की भी नहीं हुई थी
ख़ुशक़िस्मती यह कि इस दफ़ा हमारे तहख़ाने में
कोई रूसी नहीं घुसे लेकिन वे
सिटी हॉल पर पहरा देते थे टैंकों से
हमारी सड़क पर भी गड़ा रहे थे तार के खंभे
उन दिनों मुझे अच्छी-खासी रूसी आती थी मैंने
कहा उनसे जाओ अपने घर जाओ
लेकिन वे कहते थे उन्हें हम सबकी
रक्षा करती है साम्राज्यवादियों से
फिर जनसभाओं पर रोक लगी मार्शल लॉ आया
पश्चिम की ओर शुरू हुआ बहिर्गमन
मैंने भी जाने की सोची और हर पल थी मैं तैयार किसी भी मौक़े के लिए
हफ़्तों धरे रही एक ब्रीफ़केस में
एक एक अत्तिला योझेफ़, रानोती, इयेश और लौरिन्त्स साँबो की
कविता किताबें
पर आख़िरकार मैं रुक ही गई और
पिछले बरस ऐझ गुबिच गुज़र गया कैंसर से
क़ब्र पर मैंने कुछ थोड़े-से शब्द कहे
लेकिन गला रुँधा था आँसू से
तड़-तड़ गिर रही थी बर्फ़ और
शायद ही कोई सुन पाया
मेरी आवाज़
- पुस्तक : दस आधुनिक हंगारी कवि (पृष्ठ 111)
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक गिरधर राठी, मारगित कोवैश
- प्रकाशन : वाग्देवी प्रकाशन
- संस्करण : 2008
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.