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विरोध का विलोम पर्याय नहीं है समर्थन का

virodh ka vilom paryay nahin hai samarthan ka

सुमन शेखर

सुमन शेखर

विरोध का विलोम पर्याय नहीं है समर्थन का

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    मैं हूँ युद्ध में मारे गए सिपाही की तरह

    तुम हो उस युद्ध की ज़मीन

    जिसके लिए मारा गया मैं एक दिन

    तुम तक पहुँचना इतना आसान भी नहीं

    पहुचकर साबुत बचा रह जाना उससे भी मुश्किल है

    तुम्हारे चुप रहने पर जो जो कर सकता था किया

    होंठ पर लिपस्टिक लगाकर बनाया हनुमान सा चेहरा

    सिगरेट की तलब को निबटाने पैर की उंगली से जलाई माचिस

    उदासी के ऊपर निराशा को हरका कर पिन कर ली घँटों भर की मुस्कान

    नहीं मुस्कुराये तुम

    नहीं रुका मैं

    नहीं दिखे तुम फिर कभी पहले से

    दिनों-दिन लुप्त होता गया मैं

    यथार्थ के एकल पक्ष को ढोते जाना

    विचारों को कुंद करता है

    पक्ष कितने जानने होंगे

    कि ‘अनभिज्ञ’ शब्द विलुप्त हो जाए!

    विरोध का विलोम

    पर्याय नहीं है समर्थन का

    पीले के बीच उभरा हुआ हरा भी

    बेनूरी में थककर लो आख़िर पीला हो ही गया

    कहने में कितनी ही शुद्धता हो

    कहना और भी ज़्यादा बचा रह जाता है

    तुमने कहने में चुप्पी कही

    मैंने उस चुप्पी की जगह लिया शब्दों का सहारा

    इंसानों की तरह शहर का भी अपना प्रेम होता है

    जितना जानते हैं, और जानने की इच्छा होती है

    अंततः दोनों ही मारे गए प्रेम के शहर में

    जितनी आँखें हैं

    उतनी है दृश्य की भिन्नता

    “मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकता”

    फिर भी, बीते कई वर्षों में

    पास रहकर भी रहा अदृश्य की तरह

    एक चुप्पी देह को हमेशा ढकती रही

    तुम्हें ढूँढते हुई पूरी दुनिया छान हताश आया लौटा

    तुम अलमारी में पड़ी मेरी सबसे पसंदीदा किताब के बीच के पन्ने पर मिली

    शहर, शब्द, प्यार, चुप्पी, अनकहा, तलाश

    सब तुम्हारे अर्थ का पर्याय हैं

    जब नहीं रहीं पास, इन्होंने गिरने नहीं दिया

    ख़ैर, संभाला भी नहीं इसने ये अलग बात है

    ऐसे ही तुम्हारे होने को मैंने

    तुम्हारे हमेशा से बने रहने की तरह बचाए रखा

    (मिस्ट्री ट्रेन को देखते हुए)

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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