विरह गीत
virah geet
सुखना झील में बुलबुले
जैसे गर्भ के अथाह में
शिशु का हाथ-पैर चलाना
मैं एकाकीपन में भी
साथ लिए घूमती हूँ
बारहमासी दायित्वों से ठसाठस
अपने बोझिल कंधे
मेरे साथ मेरे अनुभव एवं
अनुभूतियाँ, रेंगते हुए
कानखजूरे सैकड़ों
मैं उन्हें झटक देना चाहती हूँ
इसी झील में
इसके बहाव की तीक्ष्णता
क्या मेरे भीतर के अवसाद को
चीर सकने में सक्षम है
मैंने वहाँ देखा लड़कपन में रंगी
लड़कियों का एक झुँड
दाने डालती हंसो की आशा में
हंस कहाँ छुपे बैठे थे?
हंस विलुप्त घोषित कर दिए गए थे।
घोषणा हुई
एक युवक ने छलाँग लगा दी—
प्रेम में पराजित
उसके विकल्प मर चुके थे पहले
झील में गोताखोर हाथ-पाँव चलाते
लेकिन आज दिहाड़ी नहीं मिली उतनी
युवक को अब शव कहा जाने लगा
झील में तारों माफ़िक बुलबुले
और सर्वेक्षण की पोथियों में
युवक ओझल हो गया
न जाने उसके जैसे कितने,
जैसे वो कभी था ही नहीं
तड़के सवेरे झील आया था
रात भर चिंतन-मनन करता रहा
उसके बग़ैर कैसे जीता
माँ-बाप नकारा कहकर कोसते
‘कब कमाएगा हमारा श्रवण कुमार?’
फंदा कठिन था
ज़हर का बंदोबस्त भी हो जाता
मगर उसने झील चुनी
भरी बरसात में
और आज जीवन अध्याय समाप्त कर दिया
और मैं उनींदी आँखों से
प्रतीक्षारत जीवन को काटती हुई
बुलबुलों के ऊपर से फाँदकर
जाना चाहती थी, उस पार
फिर पूछती उससे
देह तुम्हारी छूट गई
आत्मा से कैसे निकाल फेंकोगे अपनी प्रेमिका को
बेबस माँ, लाचार पिता
उनकी रुलाई झील में घुल गई
खारे पानी में हंस कैसे खेलते,
बोलो-बोलो
कितने हंसो के जोड़े विरहगीत गाते-गाते मारे गए
- रचनाकार : ऋचा कश्यप
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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