तुम इतनी सुंदर हो और मैं मूर्ख हूँ
कि तुमसे प्रेम करता हूँ—यह एक ऐसा विषय है
जो गीतों और कविताओं में बार-बार लौटता रहता है
लगता है इसमें किसी भिन्नता की गुंजाइश ही नहीं
मैंने कभी किसी को यह गाते नहीं सुना कि
मैं इतनी सुंदर हूँ और तुम मूर्ख हो कि करते हो मुझसे प्रेम—
जबकि यह विचार निश्चय ही
स्त्रियों और पुरुषों के मन में समान रूप से आया होगा
तुम इतने सुंदर हो, अफ़सोस कि तुम मूर्ख हो—यह एक और
पंक्ति है जो कहीं सुनने को नहीं मिलती
या यह कि तुम मूर्ख हो कि मुझे सुंदर समझते हो—यह पंक्ति
तो आप कभी भी नहीं सुनेंगे, यक़ीनन
आज दोपहर बिना किसी ख़ास वजह
मैं जॉनी हार्टमैन को सुन रहा हूँ—
उसकी गहरी आवाज़ प्रेम, सुंदरता और मूर्खता
इन तीनों धारणाओं को ऐसे स्वयं में समेट सकती है
जैसे किसी और की नहीं
यह ऐसा महसूस होता है जैसे सुबह के तीन बजे
किसी ने बेबी ग्रैंड पियानो पर जलती हुई सिगरेट छोड़ दी हो—
और धुआँ ऊपर उठते-उठते तेज़ रोशनियों में घुलने लगे
जबकि बाहर अँधेरे में
कुछ सुंदर मूर्ख मेज़ों के इर्द-गिर्द इकट्ठा हो गए हैं—
कुछ अपनी आँखें मूँदे हुए,
कुछ संगीत की ओर झुके हुए,
जैसे इसी ने उन्हें थाम रखा हो,
या गिलास में बर्फ़ के टुकड़े धीरे-धीरे घुमाते हुए
एक सुरबद्ध सपने में फिसलते जा रहे हों
हाँ—यह सारी मूर्खतापूर्ण सुंदरता है
जो आधी रात के पार जन्म ले चुकी है
और घर जाने की कोई इच्छा नहीं रखती
ख़ासकर अब जब कमरे में मौजूद हर कोई
उस भारी-भरकम आदमी को देख रहा है जिसके
गले से टेनर सैक्सोफ़ोन सोने की मछली की तरह
लटक रहा है।
वह मंच के किनारे की ओर आगे बढ़ता है
वाद्ययंत्र मेरी ओर बढ़ाता है
और सिर हिलाकर इशारा करता है—बजाओ
मैं माउथपीस होंठों से लगाता हूँ
और अपनी पूरी ज़िंदा साँस से उसमें फूँक मारता हूँ
हम सब कितने मूर्ख हैं—
मेरा लंबा बेबॉप सोलो यहीं से शुरू होता है,
कितने बेहिसाब मूर्ख—
और हम बिना जाने ही कितने सुंदर हो चुके हैं।
- रचनाकार : बिली कॉलिन्स
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए शायक आलोक द्वारा चयनित
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