एक
धरती सूखी है और वे अभाव में जीते हैं
हर एक के भीतर एक छोटा-सा भंडार है
उग्र संगीत का, जो गले में भारी होकर अटका है
वे उसे घसीटकर बाहर लाते हैं और अपने पैरों में गड़े नाख़ूनों के साथ
रात को अस्तित्व में आने के लिए फुसलाते हैं
क्षणिक विश्वास
झिलमिलाते सेक्विन और झूठों से चमकती एक स्कर्ट
और इस रात में—जो सचमुच रात नहीं है
हर शब्द एक इच्छा है, हर वाक्यांश
एक ऐसा आकार जिसे भरने के लिए उनके शरीर तड़पते हैं—
[मैं अपने बाल गूँथूँगी
अपने बालों में कई रंग गूँथूँगी
मैं अपने बालों में एक लंबी चोटी डालूँगी
और वहाँ तुम्हारा नाम लिखूँगी]
वे गुरुत्व को ललकारते हैं—
ताकि फिर उसी की खिंच में लौट सकें
उतरने का शोर
धरती पर पड़ती उनकी उन्मत्त थपक।
दो
और केवल वे ही नहीं। केवल
वह जर्जर-सा परिवार नहीं, चाचा,
चचेरे भाई नहीं, केवल वह नर्तक नहीं
जिसकी एड़ियों ने
समय को काट-काटकर
ठोंक दिया है
ताकि घंटे वहीं ठहरे-ठहरे बहें
टिन की नदी की तरह, चिह्नित करते हुए
केवल वह जो कभी था
केवल घिसटती आवाज़ें ही नहीं
नदी के विरुद्ध, न ही वे हाथ
जो उन्हें और आगे ढकेलते हैं, उँगलियाँ
अंधे पक्षियों की तरह, हथेलियाँ ख़ाली
प्रतिध्वनित होती हुई
केवल वे स्त्रियाँ ही नहीं
जिनके चेहरे गंभीर हैं और बालों में फूल
जो ऐसे नाचती हैं
मानो वे दफ़न कर रही हों
स्मृति को—एक आख़िरी बार—
अपने नीचे
और मुझे यह यहीं करना अच्छा नहीं लगता
स्वयं को उनके पास भारीपन से रख देना
अब नहीं, जब वे यह सिद्ध कर चुके हैं
कि शरीर एक मिथक है, एक दृष्टांत
उसके लिए जिसे भाषा तक
इतनी शीघ्रता से नाम नहीं दे पाती
अगर मैं उसे पीड़ा कहूँ और उसे छूने की कोशिश करूँ
अपने हाथों से, अपने ही जीवन से
तो वह स्थिर पड़ा रहता है और संगीत विरल हो जाता है
कपड़ों के आर-पार टटोली गई एक धड़कन
अगर मैं उस चाह की ओर झुकूँ जहाँ से यह शुरू होती है—
अगर मैं खुले बटन के साथ उस आघात में झुकूँ
एक के बाद एक हानि के, प्रेम को फेंके जाने के
उन्मादी शून्य में—
तो वह मुझे अपने साथ और दूर ले जाता है
उन स्वरों तक जो खिंचते और मुड़ते हैं
रंगीन काँच से होकर जाती रोशनी की तरह।
लेकिन वह आगे दौड़ता जाता है, छायाओं की ओर
जहाँ वह दुनिया जिसे मैं जानती हूँ
और वह दुनिया जिससे मैं डरती हूँ
सम्मिलन की धमकी देती है।
तीन
हमेशा एक सड़क होती है
समुद्र, काले बाल और पीड़ा
हमेशा एक प्रश्न
जो स्वयं से भी बड़ा होता है—
[लोग कहते हैं कि तुम सोमवार को जा रहे हो
तुम मंगलवार को क्यों नहीं जा सकते?]
*दुएन्दे : रहस्यमय रचनात्मक आवेग
- रचनाकार : ट्रेसी के. स्मिथ
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए शायक आलोक द्वारा चयनित
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