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उदास स्मृति

udaas smriti

अंकित कुमार

अंकित कुमार

उदास स्मृति

अंकित कुमार

और अधिकअंकित कुमार

    कभी-कभी साँझ के धुँधले में या यूँ ही बैठे हुए

    सोचता हूँ तो मुझे अपना गाँव याद आता है

    वैसे ही जैसे किसी पुराने गीत की धुन

    अचानक स्मृतियों में लौट आए,

    वह गाँव जहाँ कभी पगडंडियाँ

    क़दमों की आहट से जीवित रहती थीं,

    आज जैसे समय की धूल ओढ़े

    चुपचाप पड़ी हैं,

    बरगद अब भी खड़ा है मगर उसकी छाँव में

    कहानियाँ सुनाने वाले लोग कम हो गए हैं

    हवा अब भी बहती है पर उसमें पहले जैसी आत्मीयता नहीं

    मानो वह भी किसी की प्रतीक्षा में हो,

    खेत दूर तक फैले हैं मगर उनकी हरियाली में

    अब एक अनकहा विराग घुला हुआ है

    जैसे धरती ने सीखा हो मुस्कुराते हुए उदास रहना,

    शहरों ने बहुत कुछ दिया पर बदले में छीन लिया

    मिट्टी की वह सौंधी गंध, वे रिश्ते,

    जो किसी परिचय के नहीं,

    सिर्फ़ अपनत्व के मोहताज थे

    और अब जब स्मृतियों के द्वार खुलते हैं,

    तो गाँव किसी स्थान की तरह नहीं,

    एक खोए हुए युग की तरह लौटता है

    जहाँ सब कुछ अब भी है सिवाए उस समय के

    जिसने उसे सचमुच गाँव बनाया था।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अंकित कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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