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तुम्हारे होने की परिभाषा

tumhare hone ki paribhasha

रिदम राही

रिदम राही

तुम्हारे होने की परिभाषा

रिदम राही

और अधिकरिदम राही

    जीवन संदर्भों में तुम्हारा मिल जाना कुछ ऐसा था

    जैसे एक रात से छूटी हुई राहत देती

    ओस की कुछ ठँडी बूंदें मिल गई हों

    धूप से चलकर थकी हुई मेरी छाया को

    पतझड़-पतझड़ मेरे जीवन को

    एक किनारा मिल गई हो

    जैसे अस्पष्ट बिंबों का तुम स्पष्ट बिंब

    हाँ, जहाँ जटिल शब्दों से छनकर

    निकल आता है उनका मूल अर्थ

    और फिर सरल और सहज हो जाता है

    यूँ चलते हुए जीवन विस्तार में

    कुछ आर-पार हो जाता है

    कुछ रह जाता है हमारे पास, जो हमारा होता है

    वही पास रह जाना तुम हो

    घटते हुए चंद्रमा का एक बढ़ता हुआ निश्चित क्रम

    तुम रोशनी बढ़ती हुई, मद्धिम-मद्धिम

    हाँ, थोड़ा-थोड़ा दमकती रहती हो

    चमकती रहती हो अँधेरी रातों में

    जुगनुओं जैसी मेरे पास

    यूँ लिख रहा हूँ तुम्हें तुम्हारे मूल अर्थों के साथ

    तुम बह रही हो मेरे सृजन में साफ़ पानी की तरह

    मन की पगडंडियों के किनारे जगह बनाती

    बिना किसी उथलेपन के

    गहराई बनकर

    ऐसे ही तुम्हारा साथी बन जाना भी जीवन है

    वह हिस्सा जहाँ कुछ अच्छा लगे

    वही दर्पण है

    और तुम पारदर्शी प्रतिबिंब

    जहाँ से उठा लेता हूँ मैं अपने मन की तमाम बातें

    बिना शोर के, खामोशी और बिना सांसें खोए

    तुम्हारा मिल जाना तो ऐसा ही है

    बेचैन आसमान का धरती के निकट आना

    सागर की तलहट में आफ़ताब के किसी हिस्से का समा जाना

    किसी हिस्से का मखमल हो जाना

    डहेलिया हो जाना

    गुलमोहर का फूल हो जाना

    गुलाब की महक हो जाना

    किसी भोर में पंछियों की चहक हो जाना

    जीवन संदर्भों में तुम्हारा मिल जाना

    अब कुछ ऐसा ही है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रिदम राही
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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