कहानी : सॉरी, यू आर नॉट रजिस्टर्ड!
राकेश बिहारी
14 सितम्बर 2026
यह दिसंबर की साँझ थी। पावर प्लांट की एक परिचित, ठंडी और गहराती साँझ।
प्रशासनिक भवन के भीतर अभी भी रोशनी थी... हल्की, दूधिया, स्थिर, अलसाई हुई-सी जैसे ऑफ़िस की ट्यूबलाइटें भी पूरे दिन की गहमा-गहमी का वज़न ढोकर थक चुकी हों। फ़ाइनेंस हॉल लगभग ख़ाली था। डेस्कें शांत। कंप्यूटर की स्क्रीनें नीली नींद में डूबी हुईं। दिनभर अधिकारियों का वज़न उठाकर थक चुकी कुर्सियाँ भी विश्राम करने के लिए लाइट ऑफ़ होने का इंतज़ार कर रही थीं।
सब जा चुके थे। केवल उत्कर्ष बचा था। धीमे और बेहद संयत क़दमों से वह गलियारे की ओर बढ़ा। देर तक चलने वाली टेंडर कमिटी की मीटिंग की थकान उसके कंधों पर किसी अदृश्य बोझ की तरह टंगी हुई थी। गलियारा पर्याप्त ठंडा हो चुका था। फ़र्श पर लगी टाइल्स पर पड़ते हुए उसके जूते लगभग जीती-जागती-सी प्रतिध्वनि पैदा कर रहे थे। टेंडर मीटिंग की स्मृतियाँ जैसे उन प्रतिध्वनियों में शामिल होकर उसके समानांतर चलने लगीं...
टेंडर कमिटी के बाक़ी दोनों सदस्य किसी भी तरह एक बिडर को तकनीकी रूप से अयोग्य घोषित कर देने पर तुले हुए थे। जिस सूक्ष्म तथ्य को आधार बनाकर उस बिडर को टेक्नीकली डिसक्वालिफ़ाई करने की बात चल रही थी, उसका टेंडर डॉक्युमेंट में कोई ज़िक्र तक नहीं था। कई बार बिड खुलने की तारीख़ को आगे बढ़ाने के बाद सिर्फ़ दो एजेंसियों ने निविदा में भाग लिया था। उत्कर्ष इस बात को समझता था कि इस बिडर के अयोग्य घोषित होते ही यह एक सिंगल टेंडर का केस हो जाएगा। और इस तरह प्रतिस्पर्धी निविदा की संभावना पूरी तरह ख़त्म हो जाएगी।
उसने इस बाबत अपने बॉस से भी बात की थी। बॉस तुरंत कुछ नहीं बोला। मेज़ पर रखी फ़ाइल के कोने पर उसकी तर्जनी देर तक फिसलती रही। उत्कर्ष उसकी चुप्पी का अर्थ नहीं समझ पाया।
फिर उसने धीमे स्वर में कहा—“तुम्हारी बात भी ठीक है...”
वह फिर चुप हो गया। उसने एक बार सिर उठाया, जैसे आगे कुछ और कहना चाहता हो। लेकिन अगले ही पल उसका चेहरा फिर उसी परिचित भावहीनता में लौट आया।
“...लेकिन अगर सबकी सहमति नहीं बन रही तो कमिटी बहुमत के आधार पर रेकमेंडेशन दे सकती है।”
उत्कर्ष को बॉस का यह रुख़ पसंद नहीं आया था। यदि घोष साहब होते तो उसके इस आब्ज़र्वैशन की ज़रूर सराहना करते। पल भर को उसके कानों में घोष साहब की आवाज़ गूँजी थी—“तुम ठीक सोच रहे हो। बाक़ी लोग सहमत नहीं हैं तो कोई बात नहीं। अपना मत फ़ाइल में दर्ज करके आगे बढ़ो। याद रखना, फ़ाइलें सिर्फ़ आज के लिए नहीं लिखी जातीं। कब, कौन, किस संदर्भ में उन्हें पढ़ेगा, यह हम नहीं जानते।” अगले ही पल उसे एहसास हुआ, घोष साहब के रिटायर होने के बाद दफ़्तर से ऐसे ठोस और खरे शब्द ग़ायब ही हो गए थे।
बॉस की बेरुख़ी के पीछे के सच को बहुत अच्छी तरह पहचानता था वह। लेकिन, कुछ कह नहीं सकता था। ऐसा करना गोपनीयता और परस्पर सम्मान की भावना को खरोंचना माना जाता। बॉस के ठंडे रुख़ की स्मृति ने उसके भीतर एक अनकही कंपकपाहट पैदा कर दी थी, जिसका जाती हुई दिसंबर की ठंड से कोई संबंध नहीं था। इन्हीं ऊहापोहों के बीच वह गलियारे के अंत में पहुँचा, जहाँ दीवार पर सफ़ेद रोशनी से चमकती ‘फ़ेस-रीडिंग अटेंडेंस मशीन’ किसी मौन प्रहरी की तरह खड़ी थी।
आम दिनों की तरह ही वह मशीन के आगे खड़ा हुआ। अपना चेहरा स्क्रीन के सामने झुकाया। लेकिन अन्य दिनों की तरह मशीन में कोई हरकत नहीं हुई। कुछ पल बाद मशीन की हरी रोशनी उसके चश्मे पर चमकी और मशीन के भीतर क़ैद एक परिचित स्त्री आवाज़ ने जैसे किसी अदृश्य उलझन के साथ कहा—“Sorry, you are not registered.”
उत्कर्ष हल्का-सा मुस्कुराया—कड़वाहट और करुणा की मिली-जुली, बमुश्किल दिखने वाली मुस्कान। उसने चश्मा उतारा। निमिष भर को आँखें बंद कीं, फिर स्क्रीन की ओर देखा। मशीन के स्थिर चेहरे पर एक बार फिर से वही हरी रोशनी कौंधी और उसी परिचित स्त्री आवाज़ ने एक यांत्रिक मुस्कुराहट के साथ कहा—“Thank you.” मशीन की हरी रोशनी से छनकर आने वाली यह आवाज़ अन्य दिनों की तरह ही जितनी तटस्थ थी, उतनी ही संयत। लेकिन उत्कर्ष को उस आवाज़ में आज एक अलग तरह की सच्चाई की आहट सुनाई पड़ी। उसने फिर से आँखें बंद कर लीं, जैसे उस स्त्री आवाज़ में अपने लिए एक अदृश्य सराहना का भाव महसूस कर रहा हो। एक पल के लिए उसने अपने भीतर उगते ख़ालीपन को उसी आवाज़ से भरने की सायास कोशिश की... ‘यह आवाज़ यांत्रिक ही सही, पर मेरे अस्तित्व को स्वीकारती तो है। भले एक नाम और कर्मचारी संख्या की ही तरह, लेकिन मेरी उपस्थिति दर्ज तो है यहाँ...’
तभी जाने क्यों उसे बरसों पहले की एक सुबह याद हो आई।
कंपनी में पहली बार बायोमेट्रिक अटेंडेंस लागू हो रही थी। प्लांट गेट के सामने यूनियन-एसोसिएशन का विरोध-प्रदर्शन चल रहा था। वह भी उसमें शामिल था। यूनियन के अध्यक्ष पी. कुमार स्वामी का भाषण चल रहा था—“आज मशीन से हाज़िरी लगेगी, कल आदमी की बात से ज़्यादा मशीन पर भरोसा किया जाएगा। यह सुविधा नहीं, निगरानी की शुरुआत है...”
विरोध कुछ दिन चला। फिर मशीनें दफ़्तर का हिस्सा बन गईं। धीरे-धीरे दिनचर्या का भी।
उत्कर्ष ने एक बार फिर मशीन की तरफ़ देखा। वही हरी रोशनी, वही आवाज़... जिस मशीन के विरोध में कभी वह धरना-प्रदर्शन में शामिल हुआ था, आज उसी मशीन के सामने यूँ ठिठककर किंचित संतोष का अनुभव कर रहा है। विडंबनाएँ इस तरह भी घटित होती हैं, उसने कब ऐसा सोचा था!
उत्कर्ष मशीन के सामने कुछ सेकंड और खड़ा रहा। दो बार और अपना चेहरा स्क्रीन के सामने झुकाया। मशीन से निकलती स्त्री आवाज़ ने दोनों ही बार ‘थैंक्यू’ की वही ध्वनि दुहराई। सराहना और संतोष के एक नए एहसास के साथ उसने चश्मा फिर से पहन लिया और आगे बढ़ गया।
प्रशासनिक भवन के स्वचालित दरवाज़े से बाहर निकलते हुए उसने महसूस किया, साँझ अब लगभग रात में तब्दील हो चुकी थी। सर्विस बिल्डिंग की तरफ़ से आ रही रोशनी के बीच चिमनी से निकलती धुएँ की एक लगभग नामूलम-सी लकीर बहुत दूर से प्लांट के ‘एनवायरमेंट फ़्रेंडली’ होने की गवाही दे रही थी। तेल और कोयले की मिली-जुली गंध का झीना-सा अहसास कराती हवा में एक अनोखी स्थिरता थी। दूर से स्टोन-पीकिंग एरिया की मद्धम रोशनी दिख रही थी। कोल प्लांट की ओर जाने वाले रास्ते पर रात की शिफ़्ट के कामगारों की हलचल में दैनिक अभ्यास से अर्जित क़दमताल की गूँज थी। उत्कर्ष ने सोचा, रात की शिफ़्ट वाले लोग इस ठंड में कैसे काम करते होंगे… कोल प्लांट के कामगारों की इस क़दमताल ने उसे मनोज यादव और सुरेश पटेल की याद दिला दी।
पिछले साल इसी महीने में जब पाँच दिनों तक सूरज नहीं निकला था, एक दिन बैंक वालों के साथ वह कोल स्टॉक इंस्पेक्शन के लिए गया था। कोहरा-आच्छादित सर्द धुंधलके में कन्वेयर बेल्ट की थरथराती आवाज़ कोल यार्ड तक सुनाई पड़ रही थी। बैंक अधिकारी ने स्टोन पीकिंग देखने की इच्छा ज़ाहिर की। मनोज यादव और सुरेश पटेल को उसने उसी दिन देखा था—हार्नेस पहने, हाथ में मेटल-हुक पकड़े कन्वेयर बेल्ट के ठीक समानांतर... बेल्ट पर सरकते कोयले किसी काली नदी की धार की तरह बह रहे थे, अविरल और अविराम। कभी-कभी कोयले के भीतर से किसी काले पत्थर का उभार दिखता और वे दोनों, जो कुछ फ़ुट की दूरी पर बने दो स्टोन-पीकिंग स्टेशनों पर खड़े थे, बिना समय गँवाए, हुक से उठाकर उसे बाहर की तरफ़ उछाल देते थे। कन्वेयर बेल्ट की एकसार थरथराती आवाज़ के बीच धप्प की एक ध्वनि होती, जिसकी सघनता से पत्थर के वज़न का अंदाज़ा लगाया जा सकता था। हर झटके के बाद उनकी साँसें हवा में भाप की तरह घुल जातीं, जैसे ठंड उनसे उनका थोड़ा-सा जीवन चुरा ले रही हो।
दोनों स्टोन-पीकिंग श्रमिक अपने काम में तल्लीन थे। ड्यूटी इंजीनियर पलाश खरे बैंक अधिकारी की जिज्ञासा शांत कर रहा था... “ये दोनों पिछले चौदह वर्षों से स्टोन पीकिंग का काम कर रहे हैं। इनका काम बहुत मेहनत और सावधानी का है। इनकी मेहनत से कोयले की गुणवत्ता तो बेहतर होती ही है, पत्थरमुक्त कोयले से कोल क्रशर की लाइफ़ भी बची रहती है।”
कोल प्लांट मोड़ से गुज़रते हुए उत्कर्ष ने सोचा, क्या वे दोनों इस वक़्त भी ड्यूटी पर होंगे?
इसके साथ ही एक और सवाल—क्या उन स्टोन-पीकरों को कभी कोई सुपरवाइज़र या ड्यूटी इंजीनियर इस श्रमसाध्य काम के लिए ‘थैंक्यू’ कहता होगा?
यह सवाल आते ही उसे फिर उसी अटेंडेंस मशीन की आवाज़ याद आ गई—“थैंक्यू!”
पिछले चार वर्षों से वह यह आवाज़ लगभग रोज़ सुनता आया था, लेकिन आज जाने क्यों वह उसके भीतर कहीं ठहर-सी गई थी।
उसे लगा, वे चौदह वर्षों से सिर्फ़ पत्थर नहीं चुन रहे। दूसरों की चूकों को भी चुपचाप रास्ते से हटाते आए हैं। उसी क्षण उसने मन ही मन तय किया—‘कल सुबह उन दोनों स्टोन-पीकरों से मिलकर उन्हें ‘थैंक्यू’ कहूँगा।’
टाउनशिप की सड़कों पर रात की ठंड कुछ और गाढ़ी होकर गिर रही थी। लैंपपोस्ट की रोशनी के नीचे पेड़ों की परछाइयाँ हौले-हौले झूमते हुए हवा के साथ मौन संवाद में उलझी हुई थीं। लेक पार्क, जहाँ शाम को टाउनशिप की रौनक अपने उरूज पर होती है, कुहासे के बीच लटकते मद्धम रोशनी के वृत्तों में कमजोर-सी साँसें ले रहा था। उत्कर्ष ने अपने क्वार्टर की ओर बढ़ते हुए सोचा, कितना अजीब है... दिन में किसी विशाल संयुक्त परिवार की तरह दिखनेवाला टाउनशिप, रात की चुप्पियों में किसी निर्जन टापू-सा हो जाता है।
क्वार्टर में दाख़िल होते ही जैसे बाहर पसरी शांति कुछ और सघन हो गई थी। उसने अपना बैग मेज़ पर रखा ही था कि मोबाइल की स्क्रीन पर व्हाट्सऐप मेसेज आने का संकेत झिलमिलाया। बॉस का मेसेज था—“Get ready with the justification for disqualification. Tomorrow morning. Urgent.”
बस इतना ही। एक ठंडा और संवेदनाहीन संवाद... आत्मीयता की उम्मीद तो उससे बेमानी होती, लेकिन उसे आश्चर्य हुआ, आज की चर्चा का उस पर कोई असर नहीं पड़ा। उसने फ़ोन एक तरफ़ रख दिया। थकान की एक गहरी परत उसके भीतर जम चुकी थी। न चाहते हुए भी उसने जवाब दिया—“okay sir!”
उत्कर्ष ने रात का खाना गर्म किया। पर भूख जैसे कमरे की हवा में ही कहीं अटक गई थी। उसने महसूस किया उसे साँस लेने में दिक़्क़त हो रही है। दो निवाले निगलने के बाद वह खिड़की के पास बैठ गया। सड़क की रोशनी और अँधेरे के बीच एक अजीब-सी चुप्पी बह रही थी। तभी बाहर कहीं एक कुत्ता भौंका। दूर से बाइक की आवाज़ आई और फिर थम गई। सहसा उसने महसूस किया जैसे खिड़की के बाहर एक ख़ाली दीवार उग आई है, जहाँ से कोई आवाज़ लौटकर नहीं आती… मीटिंग की पूरी शाम फिर से उसके भीतर खुलने लगी। टेंडर कमिटी के बाक़ी सदस्यों के टूटते-बिखरते तर्क, जिनमें बहस नहीं, इरादे की छाया काँप रही थी। क्वालिफ़ाइंग रिक्वायरमेंट की अनदेखी, बॉस की मुर्दा तटस्थता और सबके बीच अकेला पड़ जाने की अनकही तकलीफ़। उत्कर्ष को पहली बार लगा कि थैंकलेस होने की पीड़ा सिर्फ़ दु:ख ही नहीं पैदा करती, व्यक्ति को भीतर से खोखला भी कर देती है। ठीक उसी क्षण बिल्कुल बेवक़्त, उसके भीतर अटेंडेंस मशीन से निकलने वाली वह छोटी, अनपेक्षित थैंक्यू की ध्वनि ऐसे उभरी जैसे किसी टूटे-फूटे गलियारे में एक अप्रत्याशित दीपक जल गया हो। उसकी हथेलियाँ थोड़ी गर्म हुईं। उसे एक अजीब, अनाम-सी राहत मिली। अजीब बात थी, आज मशीन की कृत्रिम, पूर्व-रिकॉर्डेड और भावशून्य आवाज़ उसे मानवीय लग रही थी। बायमेट्रिक अटेंडेंस के ख़िलाफ़ हुए धरने-प्रदर्शन की यादें एक बार फिर बेमानी और धुँधली-सी हो गईं। मशीन वाली स्त्री आवाज़ की सुकूनदेह अनुगूँजों के साथ कुछ देर तक वह खिड़की के पास बैठा रहा। खिड़की के बाहर उग आई वह दीवार धीरे-धीरे ग़ायब हो गई थी। बाहर पसरे अँधेरे और उसके पार लैम्पोस्ट से गिरती रोशनी के बीच मौन का संवाद जब कुछ और मुखर हो उठा, वह उठकर बिस्तर पर चला गया।
नींद आती-जाती रही—कभी पलकों की सतह पर, कभी भीतर, कहीं धीमे सरकती हुई—दृश्य आपस में घुलते-बिखरते रहे। टेंडर कमिटी की मेज़, फ़ाइलों के बीच झिलमिलाती कोई अस्पष्ट छाया, चलती हुई कन्वेयर बेल्ट और उसके किनारे टिके हाथ, जो पत्थरों को बिना किसी शिकायत के एक-एक करके हटाते जाते थे। और इन सबके बीच कहीं बहुत भीतर, धड़कनों की लय के साथ आती एक बेहद महीन अटेंडेंस मशीन की वही ध्वनि।
उत्कर्ष ने अँधेरे में आँखें खोलीं। दीवार पर टंगी घड़ी अपनी मद्धम टिक-टिक में हर रोज़ की तरह ही साँसें ले रही थी। पर स्वयं उसके भीतर कुछ बदला हुआ-सा था, जैसे बहुत दिनों से यूँ ही शांत पड़ी यह ध्वनि बाहर से नहीं, उसी के भीतर से उठी हो… नींद और जाग की उस संधि-रेखा पर भी स्टोन-पीकर से मिलकर सुबह-सुबह ‘थैंक्यू’ कहने की याद यथावत थी। उत्कर्ष ने करवट बदल ली। रात धीरे-धीरे शांत हो रही थी, उसका मन भी...
अगली सुबह उत्कर्ष जल्दी उठ गया था। हवा में अब भी रात की ठंड बची हुई थी। हर दिन की तरह उठने के बाद वह कुछ देर खिड़की पर खड़ा रहा। नीचे लॉन में लगी घास पर ओस की परत यूँ चमक रही थी, जैसे उसके भीतर से कोई अदृश्य ध्वनि धीरे-धीरे फूट रही हो।
प्लांट गेट की ओर जाते हुए उसे पहली बार लगा कि ठंडी हवा के बावजूद लोहे-पत्थर-कोयले की इस दुनिया में एक उष्ण मानवीय स्पर्श भी शामिल है। कुछ ही सौ मीटर आगे वह मोड़ है, जहाँ से एक फ़्लाई-ओवर पार करने के बाद रास्ता स्टोन-पीकिंग एरिया की तरफ़ उतरता है। कोयले के साथ गतिमान कन्वेयर बेल्ट, हार्नेस बाँधकर खड़े स्टोन-पीकर, सर्द हवा और कोयले की उड़ती धूल के बीच मेटल-हुक से गिराए गए पत्थरों की आवाज़—सब के सब बिना किसी प्रयास के उसके मानस में छाए हुए थे। वह कोल प्लांट की ओर मुड़ता कि तभी गाड़ी की डैशबोर्ड में लगी स्क्रीन पर बॉस का संदेश चमका :
“Don’t forget to put up TC recommendation.
Before 9 AM.
No delays.”
आदेश भरे बस इतने से शब्द—सूखे, बेजान… लेकिन किसी अनकहे दबाव से भारी... उत्कर्ष कुछ पल के लिए स्क्रीन की तरफ़ देखता रहा। एक लंबी साँस ली और बिना शोर, बिना प्रतिरोध, बिना तर्क प्रशासनिक भवन की ओर मुड़ गया। स्टोन-पीकर्स से मिलने का रात वाला निर्णय बेआवाज़ ओस और कुहासे में भीग कर वहीं अपनी दम तोड़ चुका था।
कोहरे की चादर में लिपटी फीकी रोशनी के साथ प्रशासनिक भवन जड़वत खड़ा था। गलियारे में लगभग अस्पताल जैसी फिनायल की गंध से भरी सफ़ेदी फैली हुई थी। फ़र्श पर अभी-अभी पोंछा लगा था, इतना चमकदार कि ट्यूबलाइट की रोशनी उसमें चकत्तों की तरह कुछ उभरी तो कुछ दबी-सी दिख रही थी।
उत्कर्ष के न चाहने के बावजूद, उसके जूते गीले फ़र्श पर अपनी गवाही दर्ज करने लगे थे। एक के बाद एक, जूते के गहरे सलेटी छाप, गलियारे में इस तरह उग रहे थे जैसे किसी फ़ाइल पर उतर आई कोई अनचाही नोटिंग। उसने एक क्षण को रुककर उन निशानों को देखा और लगभग असहाय-सा आगे बढ़ने लगा, जैसे हर नया क़दम पिछली रात के निर्णय को पीछे छोड़ते जाने का एक प्रयास हो। पर भीतर कहीं हल्की-सी खरोंच भी उभरी—क्या कुछ कभी सचमुच पीछे छूटता है? या हर स्मृति फ़र्श पर पड़ी फीकी धारियों की तरह हमारे साथ चलती रहती है? उसका रंग समय के साथ ज़रूर कुछ हलका हो जाए पर उसकी छाप कभी मिटती नहीं।
पिछले दरवाज़े से घुसने के कारण अटेंडेंस मशीन तक पहुँचने में उसे कुछ वक़्त लगा। फिनायल की तेज़ गंध उसके भीतर एक अजीब-सी झनझनाहट छोड़ रही थी, जैसे यह सफ़ाई सिर्फ़ बाहर ही नहीं, उसके अंदर भी चल रही हो। मशीन ने उसके चेहरे को पहचानने की एक असफल-सी कोशिश की। स्क्रीन की हरी रोशनी में हल्का-सा कंपन हुआ और मशीन बोल पड़ी—“Sorry,You are not registered.”
चश्मा निकालकर मशीन के आगे दो-तीन बार झुकने के बाद मशीन में छिपी उस स्त्री-आवाज़ ने ‘थैंक्यू’ कहा। लेकिन, उत्कर्ष को आज उसमें कल वाली आत्मीयता की जगह एक अजीब-सा बेगानापन सुनाई पड़ा, जैसे उसने उसे बहुत बेमन से पहचाना हो। उसके भीतर अपराधबोध की एक हल्की-सी छाया उभरी, जिसमें हार्नेस से बंधे मनोज यादव और सुरेश पटेल के चेहरे पीपल के पत्तों की तरह काँपते से लग रहे थे... उत्कर्ष ने आँखें झुकाईं, तमाम कोशिशों के बावजूद फिनायल की गंध को फेफड़ों में उतरने से नहीं रोक पाया और अपने पीछे जूते की छाप छोड़ता हुआ फ़ाइनेंस हॉल की तरफ़ बढ़ गया। मशीन में छिपी आवाज़ का बुझा हुआ ‘थैंक्यू’ किसी प्रश्न की तरह उसके भीतर अब भी गूँज रहा था—“क्या तुम सच में कुछ पीछे छोड़ आए हो, उत्कर्ष? या बस आगे बढ़ने का अभिनय कर रहे हो?”
इस सवाल से पीछा छुड़ाने की कोशिश उसके भीतर तेज़ हो गई थी। टेंडर कमिटी की फ़ाइलें, बॉस के सूखे संदेश और टेंडर डॉक्युमेंट की दुनिया का शोर उस पर फिर से चढ़ने लगा था...
उत्कर्ष जब फ़ाइनेंस हॉल पहुँचा, सामने लगी दीवार घड़ी की सुईयाँ आठ बजकर पैंतीस मिनट होने के संकेत कर रही थीं। मेज़ों पर एक अजीब-सी नमी पसरी हुई थी, आलस से भरी हुई, जैसे ऑफ़िस अभी पूरी तरह जगा न हो। खिड़कियों के शीशे हल्की धुँध से ढँके थे, उसने हीटर ऑन किया। सर्वर की मंद गूँजती आवाज़ में अब हीटर के पंखों की गति भी जुड़ चुकी थी। ठंड के बावजूद उत्कर्ष के माथे पर हल्का-सा पसीना था—नर्वसनेस से, क्रोध से, या शायद उस दबाव से जिसे वह कई दिनों से ढो रहा था।
कुछ पल की नीली कौंध के बाद जब कंप्यूटर पूरी तरह रौशन हुआ, इनबॉक्स में ‘अनरेड’ फ़ाइलों की एक लंबी लिस्ट सामने उग आई। यह कल दिनभर की मीटिंग में व्यस्त रहने का नतीजा था। उसने सोचा, इसके पहले कि कमिटी मीटिंग का बुलावा आए, उसे कुछ फ़ाइलें निपटा लेनी चाहिए। लेकिन पहली ही फ़ाइल को देख माउस पर फिसलती उसकी उँगलियाँ ठिठक गईं...
“समय : 23:51 PM
विषय : टेंडर कमिटी रेकमेन्डेशन”
...यह वही फ़ाइल थी, जिसके लिए कमिटी में कई दिनों से खींच-तान चल रही थी। उसने फ़ाइल खोली और भीतर तक चुप हो गया। दोनों कमिटी सदस्यों ने क्वालिफ़ाइंग रीक्वायरमेंट के मूल्यांकन में उस बिडर को अयोग्य घोषित कर दिया था। अब गेंद उसके पाले में थी। कमिटी में बिना आपसी सहमति बनाए चुपचाप आधी रात को उसके पास भेजी गई इस फ़ाइल ने उसे व्यथित कर दिया, कुछ हद तक आशंकित और आक्रोशित भी... जिस परस्पर भरोसे और सम्मान की रक्षा करने की कोशिश में वह कई दिनों से लगा हुआ था, कमिटी के बाक़ी दो सदस्यों ने झटके से उसमें एक दरार डाल दी थी।
वह धीरे से कुर्सी की टेक पर सिर टिकाकर कुछ सेकंड आँखें बंद किए बैठा रहा। हीटर की हल्की-हल्की आवाज़ कमरे की चुप्पी में और साफ़ सुनाई दे रही थी। माउस उसके हाथ में कुछ पल के लिए स्थिर और स्पंदनहीन हो गया था। उसने स्वयं को नियंत्रित करने की एक अतिरिक्त कोशिश की। अपने भीतर उठ रहे क्रोध के ज्वार को एक निर्णायक दिशा देने के लिए एक नई वर्ड फ़ाइल खोली और डिसेंट नोट का ड्राफ़्ट टाइप करने लगा...
यह उत्कर्ष के चेहरे पर किसी काँपती परछाई-सी गिर रही कंप्यूटर स्क्रीन की बुझी हुई चमक का प्रभाव था, या उसके भीतर से फैलती बेचैनी की धूसर लकीरों का, उसके लिए सुबह की रोशनी अचानक ही फीकी हो आई थी, स्क्रीन पर ब्लिंक करता कर्सर किसी धड़कन की तरह ऊपर-नीचे हो रहा था… उत्कर्ष को लगा, जैसे उसके भीतर भी वैसा ही कर्सर है, निर्णय और अनिर्णय की अभिसंधि पर अटका हुआ-सा। उसे अपने नोट का पहला वाक्य ठीक-ठीक नहीं सूझ रहा था। दो-तीन बार कुछ शब्दों को टाइप करने और फिर मिटा देने के बाद जब उसने ड्राफ़्ट नोट को एक टूटती और मंथर-सी गति दी, उसका मन दो हिस्सों में बँटा हुआ था—एक भावनात्मक रूप से टूटा हुआ और दूसरा अपना पक्ष रखने को उद्यत, ग़लत को ग़लत कहने की दृढ़ता से भरा हुआ।
“बिना सर्वसहमति बनाए दो कमिटी सदस्यों द्वारा प्रस्तुत इस रेकमेंडेशन से मैं हतप्रभ हूँ। कल शाम हुई चर्चा के अनुसार आज सुबह कमिटी की मीटिंग होनी थी। पर उसके बिना अचानक ही आधी रात को मेरे पास इस तरह फ़ाइल भेजे जाने का कारण मेरी समझ से बाहर है। अचनाक ही मैं कमिटी सदस्यों के बीच अपारदर्शिता, संवादहीनता और परस्पर विश्वास की कमी का अनुभव कर रहा हूँ। कमिटी के दो सदस्यों के इस व्यवहार ने मुझे व्यथित और आहत किया है। मैं कमिटी के इस रवैये का प्रतिरोध करता हूँ और कमिटी रेकमेंडेशन के प्रति असहमति ज़ाहिर करते हुए अपना पक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ—
जिस आधार पर बिडर को Non-Qualified घोषित किया गया है, उसका क्वालिफ़ाइंग रीक्वायरमेंट की पूर्व-निर्धारित शर्तों में स्पष्ट उल्लेख नहीं है। ज़रूरत के अनुसार इस संदर्भ में कुछ बिंदुओं पर बिडर से स्पष्टीकरण भी माँगा जा सकता था, जो प्रक्रियासम्मत भी है। बिडर से बिना स्पष्टीकरण माँगे, क्वालिफ़ाइंग रीक्वायरमेंट की पूर्व-निर्धारित शर्तों की एकांगी व्याख्या के आधार पर उसे अयोग्य घोषित करना मेरी दृष्टि में उचित नहीं है। पहले ही इस टेंडर के विरुद्ध सिर्फ़ दो ही बिडरों के रेस्पॉन्स प्राप्त हुए हैं। ऐसे में एक पार्टी को अयोग्य घोषित करने के बाद यह एक सिंगल टेंडर का केस हो जाएगा और हम प्रतिस्पर्धी मूल्य की संभावना से वंचित रह जाएँगे। इस तरह अयोग्य घोषित किए जाने पर बिडर क़ानूनी कार्रवाई भी कर सकता है। अतः मैं इस बिडर को अयोग्य घोषित करने के निर्णय से असहमत हूँ और सक्षम अधिकारी से आग्रह करता हूँ कि अनुमोदन के पहले इन बातों का भी ध्यान रखा जाए।”
अंतिम पंक्ति पूरी करने के बाद उत्कर्ष ने की-बोर्ड से हाथ हटाए और कुर्सी की पीठ से सिर टिकाया। भीतर एक हल्का-सा सुकून उतर आया।
उसने ड्राफ़्ट एक बार फिर पढ़ा। उसे लगा, कई दिनों बाद उसने अपने ही भीतर की आवाज़ को बिना काटे-छाँटे पूरा सुन लिया है। एक क्षण को उसने सोचा, इसे अंतिम रूप देने से पहले बॉस को दिखा दे। लेकिन बॉस का ठंडा रवैया और संदेशों के बहाने बनाया गया दबाव याद आते ही उसने यह विचार छोड़ दिया।
अगले ही क्षण एक दूसरा डर भीतर उठ खड़ा हुआ—अगर इस नोट की वजह से प्रबंधन उससे नाराज़ हो गया तो?
अभी-अभी मिला सुकून जैसे फिसल गया। इस समय उसे अपने निर्णय के लिए किसी के नैतिक आश्वासन की ज़रूरत थी। कोई बस इतना कह दे—‘तुम ठीक कर रहे हो।’
उसने कुछ क्षण आँखें मूँद लीं।
तभी जाने क्यों उसके भीतर फिर मशीन से निकलने वाली वही आवाज़ गूँजी। वह बिना देर किए कुर्सी से उठा और गलियारे की ओर चल पड़ा।
उत्कर्ष के सामने खड़ा होते ही स्क्रीन पर वही हरी रोशनी चमकी और अगले ही क्षण वही परिचित आवाज़ सुनाई दी—“थैंक्यू!”
मशीन की आवाज़ एक क्षण के लिए उसके भीतर किसी उष्ण आश्वस्ति की तरह उतरी, जैसे किसी बहुत अपने ने उसकी डिसेंट नोट को पढ़कर चुपचाप उसकी पीठ थपथपा दी हो। उस एक क्षण के लिए वह भूल गया कि वह आदमी नहीं, मशीन के सामने खड़ा है। असहाय क्षणों में इस हौसला-आफ़ज़ाई के लिए वह अपनी तरफ़ से उसे थैंक्यू कहना चाहता था। मशीन की स्क्रीन पर उभर आई अपनी ही तस्वीर को उसने एक प्रशंसा-भाव से देखा और ख़ुद-ब-ख़ुद उसके होंठ बोल पड़े—“थैंक्यू”।
मशीन की स्क्रीन पर उसकी छवि दो बार हिली थी। मशीन ने अपनी उसी लय और गति में जब दो बार थैंक्यू कहा तो उसे समझ आया कि वह मशीन के सामने खड़ा था। उस पल वह ख़ुद से ही झेंप गया। अगल-बगल देखा कि कोई उसे देख तो नहीं रहा और अपने चेहरे पर एक लगभग नामालूम-सी मुस्कान लिए फ़ाइनेंस हॉल की तरफ़ बढ़ गया।
अपनी सीट पर लौटकर उत्कर्ष कुछ देर निश्चल बैठा रहा, जैसे किसी अदृश्य संघर्षभूमि से लौटकर आया हो। मॉनिटर की हल्की नीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी और सामने खुला हुआ डिसेंट नोट फ़ाइल के किसी धड़कते हुए पन्ने जैसा काँपता दिख रहा था। वह उसे फिर-फिर पढ़ता रहा—धीमे, फिर तेज़, फिर ठहरकर, जैसे ख़ुद से ही कोई संवाद कर रहा हो। हाँ, यह सही है—ग़लत को ग़लत कह सकना ही तो ईमानदारी है। ऐसा सोचते हुए उसकी साँसों में एक हल्की-सी दृढ़ता भर जाती, फिर अचानक, अगले ही पल कमिटी रेकमेंडेशन पर दूसरे दो सदस्यों के नाम देखकर उसके भीतर कोई धुँधली-सी खीज उठती... हो सकता है उनके बॉस ने भी उन पर दबाव बनाया हो। लेकिन, फ़ाइल पुट अप करने से पहले एक बार उसे बता तो सकते थे—यह बात उसे लगातार चुभ रही थी...
असहमति के साहस और किसी अनाम-अदृश्य डर के बीच उत्कर्ष का मन किसी पेंडुलम की तरह हिल रहा था—धीमा, तेज़, फिर धीमा। इसी बीच इंटरकॉम की कर्कश घंटी शांत तालाब में फेंके गए पत्थर की तरह बज उठी...
“हाँ सर… अभी आ रहा हूँ।”
बॉस के कमरे में क्या हुआ, बाहर किसी को नहीं पता चलेगा। पर उसके कमरे से बाहर आते हुए उत्कर्ष के चेहरे पर सुबह से उग आई चिंता की लकीरें कुछ और गाढ़ी हो गई थीं... बॉस के कहे शब्द किसी काँटे की तरह उसके मन-प्राण में अटक गए थे... “बस आज भर का टाइम है। कल सुबह तक फ़ाइल डायरेक्टर के पास पहुँच जानी है। इसके लिए सीधे कॉर्पोरेट ऑफ़िस से फ़ोन आ रहे हैं। अगर तुमने किसी की राह में आने की ज़िद ही ठान ली है, तो किसी रीमोट लोकेशन पर जाने की तैयारी शुरू कर दो।”
“रीमोट लोकेशन”—ये दो शब्द किसी नुकीले तीर की तरह उसकी मांस-मज्जा तक में उतर गए थे। उसने महसूस किया कि कमरा अचानक ही कुछ और ठंडा हो गया है, ढलते हुए दिसंबर की सुबह से भी ज़्यादा ठंडा...
पूरा दिन वह डिसेंट नोट और कमिटी रेकमेंडेशन के बीच झूलता रहा—कभी इसे खोलता, कभी उसे। कभी इसे बंद करता, कभी उसे। उसने ख़ुद को एक ऐसे ख़तरनाक झूले में बैठा पाया जिसकी हर नई पेंग उसके लिए नई मुश्किलें पैदा कर रही थीं। अगर मैं भी उस बिडर को अयोग्य घोषित करने के निर्णय के साथ हो जाऊँ तो—होम-टाउन के पास की पोस्टिंग का सुख ही अलग है। अगर डिसेंट नोट लिखकर अपनी असहमति दर्ज कराऊँ तो—प्रकाश सर की तरह वही बेमन के तबादले… प्रोमोशन की गाड़ी का एक ही स्टेशन पर सालों तक रुक जाना—और यदि अयोग्य घोषित होने के बाद वह बिडर कोर्ट केस या विजिलेंस में शिकायत कर दे तो उन स्थितियों की कल्पना भर से उसके रोम-रोम में हज़ारों काँटों की चुभन महसूस होने लगी।
डिसेंट नोट और कमिटी रेकमेंडेशन के बीच पेंडुलम की तरह हिलने की गति अचानक तेज़ हो गई थी। शाम तक उसका माथा भारी होकर किसी कम ऊँचाई वाली छत की तरह झुक आया था, जिससे टकराकर उसके भीतर की आवाज़ें और भी दबी-दबी सी लगने लगी थीं। अचानक उसके झुके माथे पर एक कौंध-सी चमकी—ऑडिट जब आएगा तब देखेंगे, मैं कोई अकेला थोड़े ही हूँ
...उसने डिसेंट नोट की फ़ाइल डिलीट कर दी।
स्क्रीन एक क्षण को बिल्कुल ख़ाली हो गई—सफेद... उजली...। जैसे वहाँ अभी-अभी कुछ था और अब नहीं है।
उत्कर्ष कुछ देर तक उसी ख़ाली स्क्रीन को देखता रहा।
ऑफ़िस से बाहर निकलकर अटेंडेंस मशीन तक आते-आते आज उसके क़दम स्वतः ही धीमे पड़ गए थे। असहाय और निरूपाय होने के गहन क्षणों में हौसला देकर निर्विकार भाव से थैंक्यू कहने वाली मशीन के आगे खड़ा होने में उसे अपमान जैसा लग रहा था। ग़ैर-हाज़िर होने का डर नहीं होता तो वह आज अटेंडेंस मशीन से मुँह चुराकर, चुपचाप बाहर निकल जाता। बोझिल मन और थके हुए क़दमों के साथ वह आगे बढ़ा, जैसे अपने ही सामने अपनी हार का क़ुबूलनामा पढ़ने जा रहा हो...
अब वह मशीन के आगे खड़ा था। बिना किसी देरी के, स्क्रीन के भीतर क़ैद हरी रौशनी तेज़ी से चमकी—“Sorry, you are not registered.” उसके भीतर ज़ंग लगी कील-सा कुछ धँसा। उसने चश्मा उतारा, रुमाल से आँखें साफ़ की और फिर मशीन से नज़रें मिलाने की कुछ और कोशिशें...
फिर...फिर...
मशीन की आवाज़ में आज कोई लज़्ज़त नहीं थी... हर बार उसकी वही कर्कश ध्वनि गूँजती—“Sorry, You are not registered.” जैसे वह बार-बार उसकी पहचान पर सवाल उठा रही हो या शायद उसकी वह पहचान ही बदल गई हो, जो कल तक साफ़ थी।
कई कोशिशों के बाद आख़िरकार मशीन ने अपने तयशुदा स्वर में ‘थैंक्यू’ तो कह दिया, लेकिन इसमें आज न गर्मी थी, न राहत। किसी ख़ाली डब्बे से निकलने वाला शोर, काँच की किरचों-सा, प्रशासनिक भवन के शांत गलियारे में बिखरा पड़ा था। उत्कर्ष एक हारे हुए खिलाड़ी की चाल में गलियारे से बाहर निकल गया।
टाउनशिप को जाने वाली सड़क पर उतरते-उतरते अँधेरा घना हो चुका था, स्ट्रीट लाइटों के नीचे रोशनी के फैलते हुए छाया-वृत्त हवा में काँप से रहे थे। कोल प्लांट का मोड़ एक बार फिर उसके सामने था। उसने एक क्षण रुककर ठंडी हवा को फेफड़ों तक उतरने दिया जैसे उसकी ठंडक की सघनता को थाह रहा हो... धूल-भरी ठंडी हवा में जैसे स्टोन-पीकर्स की रुक-रुक कर चलती साँसों की गंध घुली हुई थी। हवा इतनी तेज़ थी कि कोयले से उठने वाली धूल नुकीले काँच की तरह उड़ रही थी। उसे लगा, आज वहाँ जाना सिर्फ़ कठिन ही नहीं, ख़तरनाक भी है। पिछली रात की तरह ही एक बार फिर उसने मन-ही-मन संकल्प किया—“कल सुबह... पक्का... कल सुबह उन स्टोन-पीकरों से मिलकर...” ख़ुद से किए गए इस वादे को वह धीरे-धीरे दोहराता रहा, जैसे मन ही मन किसी गहरे पश्चाताप या अपराधबोध में हो।
क्वार्टर में एक जानी-पहचानी-सी चुप्पी फैली हुई थी, लेकिन और दिनों से कुछ ज़्यादा सीली। दूधिया बल्ब की रोशनी ड्राइंग स्पेस के दायरे तक सीमित थी। खिड़की की काँच और लैंपपोस्ट के बीच फैला अँधेरा धीमी-धीमी साँसें ले रहा था। भूख थी, पर खाने का मन नहीं किया—वह सीधे बिस्तर पर किसी कटे हुए पेड़ की मानिंद ढह-सा गया...
आज की रात कल से ज़्याद भारी और ठंडी थी। नींद और जाग के बीच का परदा आज कुछ और झीना था, कुछ और छीजता-सा। अँधेरे और रोशनी के वृत्त इधर-उधर फैलते... सिमटते; फिर फैलते... फिर सिमटते। नींद और जागरण के मध्य यातनाक्षेत्र का एक अदृश्य फैलाव था, जहाँ नींद न पूरी नींद थी और न जागरण पूरी तरह जागरण ही। ज्ञात और अज्ञात के धुँधलके में साँस लेती यह सपनों की दुनिया थी जो कहीं से सपनीली नहीं थी। ऑफ़िस में कंप्यूटर के आगे बैठा उत्कर्ष, कमिटी रेकमेंडेशन की फ़ाइल को ट्रैक कर रहा है। बॉस ने अभी फ़ाइल खोलकर नहीं देखी है। इसके पहले कि वह फ़ाइल देख ले, फ़ाइल को पुल-बैक किया जा सकता था। उसने बिना किसी देरी के फ़ाइल पुल-बैक कर ली है। जल्दी से रीसाइकिल बिन में जाकर उसने शाम को डिलीट किए डिसेंट नोट की फ़ाइल को रीस्टोर कर लिया है। उसकी साँस जैसे अपनी पुरानी लय में लौटने लगी है... अब वह कमिटी रेकमेंडेशन पर लिखे ‘सहमत’ को डिलीट कर रहा है और अगले ही पल उसने डिसेंट नोट को कॉपी करके जस का तस वहाँ पेस्ट कर दिया है। ऑफ़िस की मेज़ अचानक से कन्वेयर बेल्ट में बदल गई है। कोयले का संगीतमय बहाव सतत जारी है। स्टोन-पीकिंग स्टेशन पर जाकर उसने मनोज यादव को गले लगाया है और उसे धीरे से कहा है—थैंक्यू... सबकुछ एक पूर्ण संभावना की तरह घट रहा था। दुनिया को फिर से ठीक किए जाने की संभावना... कि तभी दूसरे स्टोन-पीकिंग स्टेशन से एक बड़े पत्थर के उछाले जाने की आवाज़ आती है—धप्प...
...जब उत्कर्ष की आँखें खुलीं, कमरे में उजाले और अँधेरे की एक साझा चादर फैल रही थी। उसके भीतर एक अदृश्य हड़बड़ी की चमक कौंधी—“मुझे जल्दी ऑफ़िस पहुँचना होगा। बॉस ने अभी फ़ाइल नहीं देखी होगी...” वह लगभग भागते हुए तैयार होने लगा, ठीक उसी क्षण उसके सामने एक दूसरा विचार आ खड़ा हुआ—यह भी तो संभव है कि कमिटी सदस्यों की तरह उसने भी रात को ही फ़ाइल डायरेक्टर को भेज दी हो। यह सोच उसके भीतर किसी असहाय करुण गीत की तरह बज उठा—धीमा, उदास और मन को एकदम ख़ाली करता हुआ...
कन्वेयर बेल्ट की गतिशील आवाज़ अब भी गूँज रही होगी... मनोज यादव और सुरेश पटेल हार्नेस बाँधकर मेटल-हुक लिए अब भी खड़े होंगे। कन्वेयर बेल्ट से पत्थरों के टुकड़ों को उछाले जाने की आवाज़ें अब भी हवा में तैर रही होंगी। अटेंडेंस मशीन के भीतर क़ैद आवाज़ें अब भी लोगों के इंतज़ार में ठहरी होंगी। क्या उत्कर्ष के पास, अपने ही लिखे सत्य को फ़ाइल में वापस दर्ज करने का समय अब भी बचा होगा?
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