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तुम हो मनस्विनी

tum ho manasvini

महिमा श्रीवास्तव

महिमा श्रीवास्तव

तुम हो मनस्विनी

महिमा श्रीवास्तव

और अधिकमहिमा श्रीवास्तव

    सदियों से स्त्री

    तुम छल के

    मोहक जाल में

    फंसती आई हो।

    कभी देवी तो

    कभी त्याग की मूरत

    बता बहलाई जाती हो।

    देह ने तुम्हारी

    देहरी लांघने पर

    लांछन कई झेले

    फिर भी परम्पराएँ

    निभाती आई हो

    संस्कृति की धरोहर

    क्यों

    तुम्हें संभालनी हर बार

    नियमों को रटती

    आई दिन-रात हो।

    जानते हुए कि

    छलावा यह मनभावन

    क्षणिक सुखों को

    मन में संजोये

    रखती आजीवन हो।

    जागो स्त्रियों!

    तुम देह नहीं, प्राण नहीं

    काव्य नहीं, किस्सा नहीं

    तुम मनस्विनी

    तुम चिर जागृति हो।

    स्रोत :
    • रचनाकार : महिमा श्रीवास्तव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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