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तनिक बैठ जाओ माँ

tanik baith jao maan

ऋचा कश्यप

ऋचा कश्यप

तनिक बैठ जाओ माँ

ऋचा कश्यप

और अधिकऋचा कश्यप

    कैलेंडर के दिन

    रिले दौड़ में

    एक-एक महीना पछाड़ते

    आगे बढ़ रहे हैं

    महीने के तीसों दिन

    और फिर कभी इकत्तीस,

    मेरी घड़ी की महीन सुई

    टिक्क-टिक

    मेरे पीछे टूँगती हुई

    मुझे आँखें दिखाती

    माँ होती थी जब कहती

    ‘तनिक बैठ सीधी

    मैं ये निबटा दूँ।’

    कामों का क्या

    बैठे बिठाए

    ये गुणा होते रहते हैं

    जैसे किसी समांतर फ़िल्म में

    जुड़ जाता था दरिद्र के खाते में ब्याज़

    वो चाहे फटे चीथड़ों में,

    मंदिर का घँटा बजाते लहू-लुहान क्यों हो जाए

    लेकिन साहूकार को चाहिए केवल

    नोटों का चढ़ावा।

    माँ जब होती थी हमने कहाँ मोल समझा था उसका...

    बचपन में यह एक पहेली थी

    ‘माँ आख़िर सोती कब है?’

    जब देखो तब गृहस्थी में घिरी रहती

    जागी रहती

    कुछ ना कुछ निबटाती रहती।

    एक गर्मी में

    माँ बिस्तरबद्ध हुई

    डॉक्टर ने स्लिप डिस्क बताई

    माँ ने उस महीने ख़ूब बुनाई की

    दो स्वेटर छोटे बच्चों के

    उसके संग बूटियाँ, टोपियाँ

    मैंने कहा,

    बंबई में ऊनी स्वेटर काम आएँगे

    झट से बोली

    ‘बच्चे नानी घर कभी आएँगे?’

    जितनी दफ़े पीहर से लौटी

    उतनी बार

    अपने हाथों से बुनी

    पैरियाँ, स्कार्फ़ या

    बच्चों के लिए टोपी पकड़ा देती,

    मैं मना करती

    कि

    अब लगेज में गुंजाइश नहीं

    माँ मेरी कब ही सुनती

    बाहरी जेबों में घुसा देती

    जब किसी वीकेंड की फ़ुर्सत में

    मैं सामान खोलती

    किसी तह में वे चीज़ें सहेजी हुई मिलती,

    मैं एक लिफ़ाफ़े में भर

    दीवान के उस कोने में ठूँस लेती

    जहाँ मेरी बेटी की

    पहली वर्दी थी, बेटे की स्कूल की डायरी

    दोनों की प्री स्कूल की कापियाँ

    एकाध खिलौने और एक बेबी तौलिया

    एक किताब पाक कला की

    संजीव कपूर की आसान विधियाँ

    जो शायद मैंने कभी खोली तक नहीं

    यू ट्यूब में वीडियो देख लेती थी

    और

    तीन-चार दुपट्टे

    जिनके सूट मैंने दे दिए थे

    किसी साल दिवाली की सफ़ाई में,

    इनकी कुछ टाइयाँ थी,

    शादी का बंद गले का सूट

    एक शादी का कुर्ता

    और मेरी लाल प्रांदी

    और थे हमारे प्राचीन से लगने वाले जीवन के

    प्रमाण पत्र।

    मुझे मालूम था

    ये सारी वस्तुएँ

    हमारे साथ हो लेंगी

    जब हम घर बदला करेंगे

    लेकिन

    कभी प्रयोग में नहीं लाई जाएँगी

    माँ की हथेलियों पर अब

    हरी नसें फूट आई हैं

    माँ अब नहीं बुनती

    आँखें कमज़ोर हो गई

    अब सब कुछ ही

    माश दाल-सा तिमिर दिखता है

    ऐनक नहीं लगाती

    पहले टौर ख़राब होती थी

    अब आदत नहीं रही

    कहती हैं

    ‘मुझे अब क्या ही देखना है

    पोते दोहतियाँ खेलती देख ली

    अब तो बुला ले बेशक ऊपरवाला।’

    माँ जाड़े की एक सवेर नहीं उठी

    मेज़ पर बादाम पाक

    जो मैंने बनाया था

    ज्यों का त्यों पड़ा था।

    बिछौने तले घात लगाए बैठा

    सरों फूल-सा पीला स्कार्फ़ मिला

    बैंगनी फूल बूटियों का डिज़ाइन

    माँ डिज़ाइन कभी कहती

    टोकने पर भी नहीं।

    मैंने वो लगेज में साथ रख लिया,

    उसको अपनी साड़ियों संग लटका दिया

    माँ की काँपती उँगलियों की छुअन थी उसमें

    और

    डिज़ाइन था

    माँ के अंदरूनी विरोधाभास का

    कि

    माँएँ निरंतर लगी रहती है कामों में।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ऋचा कश्यप
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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