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तनी गँउआ म अँचरा उड़ावै चला

tani ganua ma anchara uDavai chala

परवाना प्रतापगढ़ी

परवाना प्रतापगढ़ी

तनी गँउआ म अँचरा उड़ावै चला

परवाना प्रतापगढ़ी

और अधिकपरवाना प्रतापगढ़ी

    सहर नगरिया दौड़े मोटरिया,

    धुँअना उड़ै असमनवा मा,

    तनी गँउआ अँचरा उड़ावै चला।

    बड़ी-बड़ी नगरी मनई कै मेला,

    हम घर अपने तौ बाटे अकेला,

    धरती पै चन्दा परोसे अँजोरिया,

    रसधार बहै पुरबी पवनवा मा,

    तुँहू चँदिया सोनवा मिलावै चला

    तनी गँउआ...

    जियरा हिलौरै पिरितिया कै बोली,

    किसनवा कै माटी मथवा कै रोली,

    रस-रस डोलै जौ फगुनी बयरिया,

    टेसू फुलान यही मनवा मा

    प्रेम रँग मा चुनरिया रँगावै चला

    तनी गँउआ...

    बरहौ महिनवा कै राजा फगुनवा

    अमवा टिकोरवा पलपकै सुगनवा,

    गलवा गुलाल रँग देहिया बँसुरिया,

    दुइधारी कटार नयनवा मा,

    दुपहरिया खेतिया रखावै चला,

    तनी गँउआ...

    पिपरा के फुनगी पै बकुलन कै डेरा,

    फुलवा के पाती पै भँवरा कै फेरा,

    तुम बिन सूनी लागै अटरिया,

    कइल्या बसेर यही मनवा मा,

    खरिहनवा चिरई चुनावै चली

    तनी गँउआ...

    जब सुधिया हमै तोहरी आई,

    नैन से निंदिया उड़ि-उड़ि जाई,

    चुर-चुर बोलै बँसवरिया

    सलोनी सुरतिया सपनवा मा

    पखनवा कै जियरा जुड़ावै चली

    तनी गँउआ...

    स्रोत :
    • पुस्तक : रस गागरी (पृष्ठ 27)
    • रचनाकार : परवाना प्रतापगढ़ी
    • प्रकाशन : अभिव्यक्ति संगम, साहित्यिक संस्था, लालगंज प्रतापगढ़
    • संस्करण : 2013

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