Font by Mehr Nastaliq Web

सूर्यमुखी

suryamukhi

आरसी प्रसाद सिंह

आरसी प्रसाद सिंह

सूर्यमुखी

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    (1)

    ऋतु वसन्त-उत्सवमे जैखन नन्दन-वनक रंगारंग

    मुक्त हस्त भऽ लुटा विधाता रहल छलाह खजाना;

    रूप, रंग, रस, सुरभि सुवासित पुरस्कार सब पौलक;

    सभक मनोरथ पूर्ण भेल, सब हथिऔलक मनमाना!

    (2)

    पारिजातकेँ भेटलइ अमरावती-निकुंज, अमरता;

    हरसिंगार लऽ लेल ललकि पावनतम ब्राह्मी वेला!

    रजनीगंधा राति-भरिक मधुगंध-मूर्च्छना मादक;

    शत-सहस्र प्रतिछविमे पाटल सौन्दर्यक मधु-मेला!

    (3)

    बेला पौलक मधुर मिलन-अभिसार प्रशान्त निशीथक;

    जुही-चमेली सखी-सहेली दिव्यवर्ण अलबेली!

    सूर्यमुखी, तोँ एकमात्र की एहि विराट वसंतक,

    समारोहसँ दूर, उपेक्षित अनाहूत रहि गेली?

    (4)

    ककरा ले आजन्म अपर्णा सती पावैती नहिता

    तोँ पंचाग्नि तापि कऽ कयलह तप हे सुव्रतशीला?

    चिन्ता जुनि तोँ करह अकारण, मिलन-वियोग दुनूमे

    एके प्रियतम वैह करइ छथि प्रेमक नूतन लीला!

    (5)

    तोँ पछुआयलि छली कि दबकल कात-कोनमे कोनो?

    नजरि पड़ल नहि ककरो की कनकाभ कान्तिपर तोहर?

    की डूबल तोँ छली ध्यानमे? भरल मानसँ आहत?

    बनि क्यो कुलिश खसल ने सहसा अचल शान्तिपर तोहर!

    (6)

    ठाढ़ पानिमे भऽ सरसीरुह सखा-सहोदर तोहर

    अर्ध्य देल अछि भरिसक तोरे ले दिनमणिकेँ अनुपम!

    लाभ-हानि, सुख-दुख, जगत संमोहित अछि जकरापर,

    नियति-नियन्ता ले विनोद से, एक खेल अछि निर्मम!

    (7)

    किछु ने रहलनि जखन कोषमे, स्वयं दिगम्बर सस्मित

    अपन समग्र हृदय कऽ देलथुन अर्पित सद्यः तोरे!

    कोटि-कोटि योजन जे प्रेमी दूर बसै छथि जगसँ,

    बान्हि लैत छै भुजा असीमित, पातर किरणक डोरे!

    (8)

    कुमुद-कलीक खुजै छै लोचन विमल चन्द्र-चुम्बनसँ;

    दृष्टि चकोरक इन्दु-बिम्बसँ लागि ललाम रहल छै!

    पृथ्वी-सहित समस्त शुक्र, शनि, राहु, केतु, गुरु, मंगल;

    परिक्रमा सूर्यक ग्रह-मण्डल कऽ अविराम रहल छै!

    (9)

    सूर्यमुखी, मार्तण्ड-मण्डलक तोँ की ग्रह छह कोनो?

    की कोनो नक्षत्रक पड़लह बिम्बित परिछाया?

    उदयाचलसँ अस्ताचल धरि भानु-बिम्बकेँ अपलक

    अवलोकैत, घुमैत रहै छह तोहर दिनभरि काया!

    (10)

    कतऽ विराट ज्योति ज्वाला-पारावार अपरिमित!

    कतऽ क्षुद्र तोँ एक अपरिचित पावक-कण भू-लुण्ठित!

    चुम्बक-शैलराज आकर्षित करबे करतह, कतबो

    अश्मसार तोँ भऽ कऽ रहबह अवगुण्ठनमे कुण्ठित!

    (11)

    जगतक आत्मा सूर्य-देव, तोँ शाश्वत सूर्यक आत्मा!

    जे अनन्त वीणामे अक्षय सुर झंकार करै छै!

    सूर्यमुखी, तोँ सिद्ध करै छह, सरिपहुँ वैह अमरसुर

    तार-तारमे जीवन-रस प्रतिपल संचार करै छै!

    (12)

    धन्यवाद तोँ दहुन कृतज्ञ हृदयसँ करुणाप्लावित

    सहानुभूति करै छथि, सदिखन तोरा प्रति जे भावक!

    तोँ वंचित रहि गेली सर्व-साधनसँ सुख-सौभाग्यक,

    धन्यवाद तोँ दहुन, भस्म नहि कऽ देलकह युगपावक!

    (13)

    बिरले आत्मा कोनो पंकजे सन उठबै छै माथा

    जन्म पंकमे लैत, सरोवर-सलिल-राशि कऽ लंघन!

    तोहर सन सौभाग्य कंकर जे परम प्रकाश बनौलक

    उद्घाटन ले तोहर आनने अपन चेतना-दर्पण!

    (14)

    ओना बेश स्रष्टाक सृष्टि-नैपुण्य बुझल अछि हमरा,

    जे सुगन्ध चानन-काठोमे देल, मुदा नहि फूले।

    फल देलनि झड़बेर सनक जे बड़क विशाल विटपमे;

    पूर-पसेरी सजिमन-तरबुज लत्ती-फत्ती-मूले।

    (15)

    कुसियारोमे जँ फल लगितय, तँ की नीक होयतै?

    मुदा सुमति देतनि के निर्बन्ध निरंकुश विधिकेँ?

    सूर्यमुखी, तोँ गाबह मंगल, करह कृतार्थ जनम तोँ;

    आलिंगन दऽ रहल केन्द्र-चैतन्य प्रकाश-परिधिकेँ!

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 1)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY