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स्त्रियाँ यात्रा-वृत्तांत नहीं लिखतीं

striyan yatra vritant nahin likhtin

मधु चतुर्वेदी

मधु चतुर्वेदी

स्त्रियाँ यात्रा-वृत्तांत नहीं लिखतीं

मधु चतुर्वेदी

और अधिकमधु चतुर्वेदी

    मेरे देश में

    हर दिन सत्तासी औरतों की

    अस्मिता

    तार-तार कर दी जाती है—

    हर पंद्रह मिनट में एक

    और हज़ारों औरतें

    ख़ुद को अपराधी मान

    घर की दीवारों में छिप जाती हैं

    भय की एक लक्ष्मण-रेखा

    गाँव की हद पर खींच दी गई है

    शाम के धुँधलके से पहले

    आँगन में बंधक हो जाना

    उसने जीवन की शर्त की तरह

    स्वीकार कर लिया है

    कहा जाता है—

    ऐसी औरतों की

    इज़्ज़त नहीं होती

    क्योंकि

    उसकी इज़्ज़त का बटुआ

    कोई पुरुष लूट ले गया है

    उसे बचाने के लिए

    वह क़ायदों की दहलीज़ में

    ख़ुद को बाँध लेती है

    बेतरह शराब पीते लेखक

    हिकारत से कहते हैं—

    ‘स्त्रियाँ अच्छे यात्रा-वृत्तांत नहीं लिखतीं...’

    वे भूल जाते हैं—

    नई जगह की हर यात्रा में

    हर दिन की

    उन सत्तासी औरतों में

    वह भी हो सकती है

    इनबॉक्स में अजनबी पुरुष

    नंगी तस्वीरें भेजते हैं

    दिन-दहाड़े पैंट की ज़िप खोल

    पौरुष दिखाते मर्द देखे हैं उसने

    सुनसान सड़क से गुज़रते हुए

    कितनों ने उसके वक्ष और नितंबों पर

    हाथ फेरकर भाग जाना सीखा है

    किसी अजनबी यात्रा पर निकलने से पहले

    वह सुरक्षा सोचती है

    फिर व्यंग्य से पूछा जाता है—

    ‘स्त्रियाँ क्रांति क्यों नहीं लिखतीं?’

    बहू-बेटियों की आँखों में

    लिहाज़ का काजल अँजवाकर,

    होंठों पर ख़ामोशी की लाली सजाकर—

    चूल्हा, चकला, बेलन, बच्चा,

    रिश्तेदारी, त्योहार, अचार,

    बीमार-अजारी,

    चहारदीवारी की ज़िम्मेदारी...

    क्या पहली मार्क्सवादी क्रांति

    पति, भाई, पिता के ख़िलाफ़

    वह लिखेगी?

    वह लिखती है

    यात्रा-वृत्तांत—

    आँगन से झाँकते आकाश का,

    छत से गुज़रते मौसम का,

    खिड़की से झूलते चाँद का

    मनमाफ़िक़ एक क़दम भी

    डायरी में दर्ज करती है

    तुमने किताबों में जीवन-दर्शन पढ़ा है

    उसने अपने गर्भ में जीवन गढ़ा है

    तुमने पीड़ा लिखी है—

    उसने उसे पल-पल जिया है

    स्त्री-क़लम लंबे समय तक

    हाशिए में बाँध दी गई—

    महादेवी वर्मा,

    शिवानी

    या

    मन्नू भंडारी बनकर

    वह लिखती रही—

    झरोखों से दिखती दुनिया,

    आँगन के किरदारों के आख्यान,

    कभी गिल्लू तो कभी भक्तिन,

    कृष्णकली की भीगी कथा,

    पूतोंवाली का दारुण जीवन,

    या बंटी के बालमन की उलझनें

    फिर भी सदियों से कहा जाता रहा—

    ‘औरतें यायावर नहीं होतीं...’

    वह कैसे रचे

    ‘मेरी तिब्बत यात्रा’-सी यात्रा

    आधी रात

    सूनी पहाड़ियों के

    जीवंत सन्नाटों का अनुभव?

    वह कभी नहीं कह पाएगी—

    ‘वह भी कोई देस है महराज!’

    क्योंकि उसे इज़्ज़त का बटुआ सँभालना है

    इसलिए वह लिखती है

    कमरे के एकांत का साहित्य—

    नम कहानियाँ,

    रिश्तों की पीड़ा की कविताएँ,

    कुनबे से विद्रोह का राग,

    देह से परे अस्तित्व की छटपटाहट।

    जो बनीं—

    गार्गी,

    महादेवी वर्मा,

    तसलीमा नसरीन,

    अमृता प्रीतम,

    अरुंधति रॉय,

    या

    बेबी हालदार—

    याद रखना,

    उन्होंने सबसे पहले छोड़ी थी

    तुम्हारी ‘अनुगामिनी’ होने की शर्त।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मधु चतुर्वेदी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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