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स्त्री, सपने और बाज़ार

stri, sapne aur bazar

महिमा श्रीवास्तव

महिमा श्रीवास्तव

स्त्री, सपने और बाज़ार

महिमा श्रीवास्तव

और अधिकमहिमा श्रीवास्तव

    माँ की कोख में ही

    हाथ-पैर सिकोड़े

    वह

    नैनों को कसके मूंदे

    सपने, देखने लगती।

    स्त्री, सपनों की दुकानें

    सजाती,

    बीच बाज़ार

    सपनों-सा सुंदर प्यार दे

    मांगती

    बस तनिक दुलार।

    तवे पर रोटी पलटती

    दाल में छन्न

    घी छोड़ती

    गुनगुनाती है

    सपनों का

    मधुर-सा गीत कोई।

    लिहाफ़ों को तह करती

    बिस्तरों की, सिलवटों में

    अटके रह गए

    सपनों को

    मेहनत से समेट लेती।

    तारों भरी रात में

    छत पर खड़ी-खड़ी

    ओस से झरते सपने

    भर लेती आँचल में।

    बाज़ार में चलता रहता

    सपनों का कारोबार

    मोलभाव होता उनका

    स्त्री के सपने बिक जाते

    औने-पौने दामों में।

    फटी आँखों से देखती रह जाती

    अपनी,

    लुटी हुई दुकान।

    अब सपनों को

    ना पास

    फटकने देना है

    यह ठान कर सोती

    पर, रात की सुनसान तन्हाई में

    नींद की खिड़की से कूद

    दबे पाँव चले आते

    फिर से स्वप्न

    तकिए पर बिखरे,

    केशों में

    सज जाने को

    स्त्री को

    फिर से हराने को।

    स्रोत :
    • रचनाकार : महिमा श्रीवास्तव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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