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स्पेन, स्पेन

spen, spen

अनुवाद : सुरेश सलिल

मिक्लोश राद्नोती

मिक्लोश राद्नोती

स्पेन, स्पेन

मिक्लोश राद्नोती

और अधिकमिक्लोश राद्नोती

    दो दिन से इसी तरह होती रही है बारिश, और जैसे ही

    मैं अपनी खिड़की खोलता हूँ चमक उठती हैं पेरिस की छतें,

    एक बादल बैठता है मेरी मेज़ पर

    और भीगी रोशनी टकराती है मेरे चेहरे से।

    चीख़ती है बारिश की मारी कालिख़ मुझ पर; उपरले घरों से—

    बहुत नीचे परनालों में खड़ा हूँ न!

    और मैं शर्मिदा हूँ बहते कीचड़ ख़बरों से

    बदरंग शाम से।

    मनहूस डैनों वाले युद्ध, चाबुक सटकारता हुआ हम पर

    सरहद के आरपार लहरा रहा है आतंक,

    बुआई-न कटाई उस पार,

    अब अंगूरों की बहार।

    नन्हें पखेरू का गान नहीं, आसमान में सूरज का ताप नहीं

    माँएँ बिन बेटों की हो गई, स्पेन,

    सिर्फ़ तुम्हारी ख़ूनी नदियाँ बह और उफ़न रही हैं।

    लेकिन नई फ़ौजें आएँगी, अगर ज़रूरी हुआ

    तो न-कुछ के बीच से उभरेंगी उन्मत्त चक्रवातों की भाँति,

    फ़ौजें कूच करती हुई

    गहरी ख़दानों से; ज़ख़्मी खेतों से।

    स्वाधीनते, जनसमूह तुम्हारी भवितव्यता को लेकर

    हुंकार भर रहे हैं। आज अपरान्ह में

    उनके गान ने तुम्हें ऊँचे उठा लिया,

    भारी शब्दों से, पेरिस के भीगते चेहरों वाले अकिंचनों ने

    गाया भव स्वतंत्रता का गान।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 237)
    • रचनाकार : मिक्लोश राद्नोती
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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