(एक)
मोस्का उपनाम वाले प्यारे नन्हें कीड़े,
किसे पता है कि आज शाम,
जब अँधेरा होने-होने को था
और जब मैं ड्युटरो-इसाइया को घोखने में मश्ग़ूल था
मेरी बग़ल में तुम क्यों नुमूदार हुए दोबारा,
लेकिन ऐनक के बिना तुम मुझे देख नहीं पाए
और ऐनक की चमक के बिना
दाग़-दाग़ धुँधलके में मैं तुम्हें पहचान नहीं पाया।
(दो)
ज़्यादा पॉवर वाली ऐनक और ऐंटीना,
बदनसीब कीड़े, महज़ कल्पना में पंखयुक्त,
एक फेंटी हुई बाइबिल के सिवा और कोई भी वस्तु सत्याभासी नहीं,
अँधेरी रात, बिजली की कौंध, और गरज
और फिर आँधी तक नहीं!
क्या ऐसा मुमकिन है कि तुम इतनी जल्दी चले गए, चुपचाप?
लेकिन यह महज़ सनक है, मेरा मानना है कि
तब भी तुम्हारे पास होंठ थे।
(तीन)
पेरिस के सेंट जेम्स में, मुझे एक आदमी वाले कमरे कौ माँग करनी होगी।
(वे अकेला मेहमान पसंद नहीं करते।)
हू-ब-हू तुम्हारे बेनेशियन होटल के
नक़ली बेज़ेंटियम तौर-तरीक़ों की भाँति।
और फिर तुरंत बाद, नीचे स्विचबोर्ड पर पहुँच कर लड़कियों का शिकार,
तुम्हारी पुरानी सहेलियाँ,
और उस पल को एक बार फिर पीछे छोड़ते हुए तीन मिनट में ऊपर!
फिर वही,
तुम्हें पाने की चाह-उसी एक भंगिमा में, उसी एक आदत के साथ।
(चार)
हमने एक पारलौकिक सीटी विकसित की थी,
पहचान का एक प्रतीक। अब मैं उसे आज़माने जा रहा हूँ
यह मानते हुए, कि हम सब पहले ही मरे हुए हैं,
और इस बात से अनभिज्ञ हैं।
(पाँच)
यह कभी मेरे दिमाग़ में ही नहीं आया
कि मैं तुम्हारा, बहती आँखों वाला भरोसेमंद कुत्ता था
या कि तुम मेरा।
औरों के लिए तुम एक कमज़ोर नज़र वाला पिद्दी-सा कीड़ा थीं
भद्रलोक की बकवाद से चकित।
वे बाबू क़िस्म के लोग थे। उन चतुर-चालाक लोगों को
यह अहसास तक नहीं हो पाया कि वे तुम्हारे परिहास के पात्र थे,
कि तुम अँधेरे में भी उन्हें ताड़ ले सकती थीं।
तुम्हारी अचूक छठी इंद्रिय, तुम्हारे चमगादड़ी राडार के ज़रिये
बेनक़ाब होते वे लोग!
(छह)
तुमने गद्य या पद्य रचकर अपने निशान छोड़ जाने की बात
कभी नहीं सोची,
यह तुम्हारी ख़ूबसूरती थी और बाद में मेरा आत्मधिक्कार।
यही बात मुझे डराती भी थी कि किसी दिन तुम मुझे
'सुखी नगर के दुखी कवियों' के टर्र् टर्र् से भरे जोहड़ में धकेल दोगी।
(सात)
आत्मदया, असीम वेदना और विकलता—
उस आदमी की, जो इस दुनिया को यहाँ और इसी वक़्त ध्याता है
जो अगले से उम्मीद करता है और निराश होता है...
(किसमें हिम्मत है अगली दुनिया के ज़िक्र की ?)
(आठ)
तुम्हारा इस क़दर रुक-रुककर, भदेस लहज़े में बोलना—
ख़ुद को तसल्ली देने को फ़क़त यही बच रहा है मेरे पास।
लेकिन लहज़ा बदल गया है, और रंगत भी।
आदी हो जाऊँगा तुम्हें सुनते रहने का,
तुम्हारे गूढ़ार्थ खोलने का—
टाइप की क्लिक क्लैक में,
ब्रिसागो सिगारों से फूटते धुएँ के कुंडलीचक्रों में।
(नौ)
सुनना—
फ़क़त यही एक तरीक़ा था तुम्हारा, मुलाक़ातों का।
न-कुछ-सा आता है अब टेलीफ़ोन का बिल।
(दस)
वह प्रार्थना करती थी ?
हाँ, सेंट एंथनी की। सेंट हर्मीज़ के क्लोकरूम में
छतरियों तथा दूसरी खोई चीज़ों को ढुँढ़ाने का ज़िम्मा उन्हीं का है।
बस्स्?
अपने मृत स्वजनों के लिए भी प्रार्थना करती थी, और मेरे लिए भी।
काफ़ी है, पुरोहित का उत्तर था।
(ग्यारह)
तुम्हारे आँसुओं की स्मृति (उतनी ज़ोर मैं दो बार रोया)
तुम्हारी हँसी के बीहड़ ठहाकों को धो नहीं सकती।
वे एक तरह के पूर्व आस्वाद थे, उस तुम्हारे अपने निजी
'क़यामत के फ़ैसले' के, आह, जो कभी जारी नहीं हुआ।
(बारह)
वसंत घोंघे की चाल से घिसटता हुआ।
अब कभी नहीं सुन पाऊँगा मैं ऐंटि—बायोटिक विषाक्तता
या कि कूल्हे की हड्डी में सुईयों की-सी चुभन की तुम्हारी शिकायत,
या उस पैतृक विरासत का ज़िक्र
जो झटक ले गया तुमसे वह सहसाक्ष
(आगे का अंश हटा दिया गया)
वसंत घने कोहरे से लदा हुआ,
लंबे-लंबे दिन और ऊब के अहसास से भरा वक़्त।
अब कभी नहीं सुन पाऊँगा मैं
समय की पिछूटन से, या प्रेतों से, या ग्रीष्मकालीन
आधिभौतिकी समस्याओं से तुम्हें जूझते।
(तेरह)
छुटपन में ही चल बसा तुम्हारा भाई,
अंडाकार गोल तस्वीर में, मेरी और ताकती,
घुँघराली लटों वाली वह नन्हीं लड़की, तुम थीं।
उसने संगीत रचा, जो न प्रकाशित हुआ
न सुना ही गया, अब दबा पड़ा होगा किसी बक्से में,
या गल-सड़ गया होगा।
अगर कोई लिखी गई चीज़ लिख गई है
तो मुमकिन है, अनजाने में कोई उसे अब फिर लिख रहा हो!
मैं उसे, कभी न जानते होने के बावजूद, प्यार करता था।
तुम्हारे सिवा किसी ने उसे याद नहीं किया।
मैंने किसी से कोई पूछताछ नहीं की,
अब इसका कोई मतलब भी नहीं।
अकेला में ही बचा था तुम्हारे बाद, जिसके लिए वह कभी था,
लेकिन तुम जानती हो, स्वयं में छायाएँ होने के कारण
हम किसी छाया को प्यार कर सकते हैं।
(चौदह)
वे कहते हैं कि मेरी कविता में किसी के प्रति कोई लगाव नहीं है
किंतु अगर उसमें तुम्हारी उपस्थिति है, तब किसी के प्रति तो हुआ ही;
तुम हो मेरी कविता में : तुम, जो रूपाकार से परे जाकर
अहसास में बदल गई हो।
वे कहते हैं कि कविता अपनी चरमावस्था में
उस सबको महिमामंडित करती है, जो दूर जा रहा है,
वे कहते हैं कि कछुआ बिजली से अधिक द्रुतगामी नहीं है,
अकेले तुम्हीं को पता था कि गति और गतिहीनता एक ही चीज़ है
कि शून्य ही पूर्णत्व है और निरभ्र आकाश
अपने सर्वोच्च बिंदु पर धुँधला हो जाता है।
अतः बंधनों और साँचों से सीमाबद्ध तुम्हारी लंबी यात्रा
मुझे अधिक संगत प्रतीत होती है।
तब भी, यह जानते हुए भी कि हम एकप्राण थे—
भले एक शरीर में या दो में, मुझे शांति नहीं मिल पाती।
- पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 140)
- रचनाकार : यूजीनियो मोंताले
- प्रकाशन : मेधा बुक्स
- संस्करण : 2003
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