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सफ़ेद कमरा

safed kamra

अनुवाद : सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज

चार्ल्स सिमिक

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सफ़ेद कमरा

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    मुश्किल है उसे साबित करना

    जो साफ़-साफ़ ज़ाहिर है।

    बहुतों को वही बेहतर लगता है

    जो नुमायाँ नहीं।

    मुझे भी। सुना मैंने

    पेड़ों को बोलते।

    कोई राज़ था उनके पास

    जिसे वे कह ही देने वाले थे मुझे

    —लेकिन चुप रह गए फिर।

    फिर गर्मियाँ आईं। तब मेरी गली का

    हर एक पेड़ ख़ुद अपना ही शहरज़ाद था।

    मेरी रातें और कुछ नहीं

    बस उनकी तकल्लुफ़ क़िस्सागोई का

    एक हिस्सा भर थीं।

    हम प्रवेश कर रहे थे

    अँधेरे बंद घरों में

    हर बार और भी अँधेरी इमारत में

    जिन्हें छोड़ दिया गया था

    जिनकी ज़ुबान हर बार चुप करा दी गई थी

    जब भी वे कुछ कहना चाहती थीं।

    मैं सो नहीं पाया पूरी रात

    इस ख़ौफ़ और विस्मय के मारे

    कि ऊपरी मंज़िल पर

    बैठा होगा कोई आँखें मूँदे।

    लेकिन फिर उस औरत ने कहा

    ठंडा और नंगा होता है सच।

    सफ़ेद ही कपड़े पहनती थी वह हमेशा

    उसने आख़िर तक अपना कमरा नहीं छोड़ा

    उस लंबी रात में

    अक्षुण्ण बची रह गई

    एकाध चीज़ों की तरफ़

    सूरज ने इशारा किया।

    बेहद मामूली चीज़ें,

    अपनी नितांत स्पष्टता की वजह से कठिन।

    उन्होंने कोई शोर-शराबा नहीं किया

    वह दिन एकदम वैसा था जिसे अक्सर लोग

    ‘बेहतरीन दिन’ कहते हैं।

    ना! क़तई वैसा नहीं

    जैसे वे दिन, जब ईश्वर भेष बदल लेता है

    बन जाता है कोई कंघी,

    जिसकी एक दाँत टूटकर खो गई हो

    या एक काला हेयरपिन

    कोई दस्ती आईना—

    बिल्कुल वैसा नहीं।

    बस वैसी जैसी होती हैं चीज़ें

    जस की तस

    उस उज्ज्वल प्रकाश में

    एकटक देखतीं, बेज़ुबान पड़ी हुईं

    और पेड़ जैसे रातों का इंतिज़ार करते हुए खड़े निर्विकार।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : चार्ल्स सिमिक

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