जन-गण-मन

और अधिकरमाशंकर यादव विद्रोही

     

    एक

    मुझे माफ़ करना मेरे दोस्तों
    मैं एक पराजित योद्धा हूँ और 
    मेरे पास तुम्हें देने के लिए 
    कोई उपदेश नहीं है
    इसलिए नहीं कि मुझे बिठा दिया गया है
    प्यास के पहाड़ों पर
    कि मेरी आँखों में टाँग दिया गया है
    भूख का भूगोल
    कि मेरी अंतड़ियों को मरोड़कर भींच दिया गया है 
    मुट्ठियों के बीच 
    कि मेरी आत्मा पर पतन का अंतिम प्रहार 
    कर दिया गया है
    वरन् इसलिए कि 
    न तो मौत आती है 
    और न मैं ये बात भूल पाता हूँ
    कि मैं एक योद्धा हूँ
    और पराजित हो गया हूँ

    दो

    मैं एक पराजित योद्धा हूँ
    और पड़ गया हूँ मौत का बिस्तर बिछाकर
    जलते हुए समंदर की बड़वाग्नि में
    मैं सोचता हूँ कि मैं बुरा फँसा
    मौत सोचती है कि मैं बुरे फँसी
    समंदर सोचता है कि मैं बुरे फँसा
    और अग्नि समझती है कि मैं बुरे फँसी
    मैं सोचता हूँ कि ये मौत बिना मारे मुझे छोड़ेगी नहीं 
    और मौत सोचती है कि ये आदमी तो मरेगा नहीं
    और समंदर सोचता है कि इस झगड़े का तो कोई 
    अंत ही नहीं है
    और अग्नि सोचती है कि जब तक अंत नहीं होगा,
    तब तक जलना पड़ेगा
    फ़िलहाल मैं एक पराजित योद्धा हूँ
    और पड़ गया हूँ मौत का बिस्तर बिछाकर
    जलते हुए समंदर की बड़वाग्नि में

    तीन

    मैं भी मरूँगा 
    और भारत भाग्य विधाता भी मरेगा
    मरना तो जन-गण-मन अधिनायक को भी पड़ेगा 
    लेकिन मैं चाहता हूँ
    कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरे
    फिर भारत-भाग्य विधाता मरे
    फिर साधु के काका मरें
    यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें
    फिर मैं मरूँ—आराम से, उधर चलकर बसंत ऋतु में
    जब दोनों में दूध और आमों में बौर आ जाता है
    या फिर तब जब महुवा चूने लगाता है
    या फिर तब जब वनबेला फूलती है
    नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके
    और मित्र सब करें दिल्लगी
    कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
    कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : नई खेती (पृष्ठ 3)
    • रचनाकार : रमाशंकर यादव विद्रोही
    • प्रकाशन : सांस, जसम
    • संस्करण : 2011

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